एनपीए नीति के केंद्र में कंसोर्टियम

अरूप रॉयचौधरी और अभिजित लेले | नई दिल्ली/मुंबई Apr 11, 2017 09:53 PM IST

नई एनपीए नीति की तैयारी

एनपीए से जुड़े निर्णय लेने में बैंकों के कंसोर्टियम को सशक्त बनाने पर रहेगा जोर
एनपीए नीति के तहत बैंकरों के लिए नई सीमा
नई एनपीए नीति के तहत कंसोर्टियम साधारण बहुमत से भी ले सकेगा एनपीए के बारे में निर्णय
बैंकरों को उपयुक्त निर्णय लेने में समर्थ बनाने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में संशोधन संसद के अगले सत्र में संभव

गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की समस्या से निपटने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की नई नीति बैंकों के कंसोर्टियम पर केंद्रित हो सकती है। सरकार एक ऐसा ढांचा तैयार करने की योजना बना रही है जो बैंकों के कंसोर्टियम को एनपीए से निपटने में कहीं अधिक समर्थ बनाएगा। इसके लिए नई नीति में वर्तमान दिशानिर्देशों में संशोधन कर संयुक्त ऋणदाता फोरम (जेएलएफ) के तहत बैंकों के ऋण और संख्या संबंधी सीमाओं को घटाया जा सकता है।

वर्तमान नियमों के मुताबिक जेएलएफ के भीतर डूबते ऋण अथवा डूबती परिसंपत्ति के संबंध में कोई भी निर्णय निवेश के लिहाज से 75 फीसदी अथवा संख्या के लिहाज से 60 फीसदी बैंकों की मंजूरी मिलने पर ही लिया जा सकता है। हालांकि इन्हें काफी ऊंची सीमा के रूप में देखा जा रहा है और इसलिए कानून में संशोधन किया जा सकता है ताकि जेएलएफ साधारण बहुमत से भी एनपीए के बारे में आसानी से निर्णय लेने में समर्थ हो सके।

बिजनेस स्टैंडर्ड को मिली जानकारी के अनुसार, सरकारी बैंकों को और अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से सरकार संसद के मॉनसून सत्र में अंतत: भ्रष्टचार निरोधक अधिनियम (पीसीए) में भी संशोधन का प्रस्ताव ला सकती है। यह एनपीए के संदर्भ में सरकार की व्यापक नीति का हिस्सा है। सरकार 6 लाख करोड़ रुपये की डूबती परिसंपत्तियों से निपटने के लिए एक व्यापक एनपीए नीति तैयार करने की योजना बना रही है क्योंकि यह देश में ऋण गतिविधियों एवं बुनियादी ढांचे के विकास की राह में एक बड़ी बाधा है। इसलिए एनपीए से निपटना मोदी सरकार की प्रमुख प्राथमिकता है।

वरिष्ठ सरकारी सूत्रों ने कहा कि वर्तमान कानून और ढांचे के तहत वाणिज्यिक बैंकों और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को डूबते कर्ज से निपटने के लिए पर्याप्त शक्तियां दी गई हैं लेकिन कंसोर्टियम में शामिल बैंकों में आमराय न बनने पर अक्सर समस्याएं आती रहती हैं। इससे निपटने के लिए सरकार एक ऐसा प्रावधान कर रही है जिसके तहत कंसोर्टियम में शामिल बैंक साधारण बहुमत से डूबते ऋण के बारे में निर्णय ले सकेंगे। इसके तहत कर्ज का नया स्तर मौजूदा 75 फीसदी से कम किया जा सकता है।

एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने कहा, 'इस प्रकार की परिस्थिति से निपटने के लिए एक समर्थ ढांचे की जरूरत होगी। इस मुद्दे पर बातचीत जारी है।' उन्होंने कहा कि इसके लिए कोई व्यावहारिक समाधान तलाशने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान ढांचे और व्यवस्था के तहत अधिकतर एनपीए मामलों को निपटाया जा सकता है लेकिन बैंकों के कंसोर्टियम के मामले में थोड़ी समस्या आती है। एक अन्य अधिकारी ने कहा कि एनपीए से निपटने के लिए केंद्र सरकार की नई नीति के तहत मुख्य तौर पर एनपीए के उन शीर्ष 35 से 40 फीसदी मामलों पर ध्यान केंद्रित किया गया है जो भारतीय बैंकिंग प्रणाली में मौजूद कुल डूबती परिसंपत्तियों का करीब 60 फीसदी के बराबर हैं। उन्होंने कहा, 'डूबते बैंक जैसी बड़ी घोषणा करने की कोई जरूरत नहीं है। एनपीए को वर्तमान कानून के तहत निपटाया जा सकता है। हालांकि कुछ मामूली बदलाव की जरूरत होगी ताकि आरबीआई और बैंकों को कहीं अधिक सशक्त बनाया जा सके।'

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