आरबीआई नहीं बदलना चाहता बैठक की परंपरा

अरूप रायचौधरी | नई दिल्ली Jun 11, 2017 09:29 PM IST

ब्याज दरों की घोषणा से पहले भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के 6 सदस्यों के साथ बैठक का वित्त मंत्रालय का 'प्रयोग' निश्चित रूप से असफल रहा है। वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लंबे समय से चली आ रही उसी परंपरा को अपनाने की संभावना है, जिसमें आरबीआई का गवर्नर दिल्ली आता है और वह मौद्रिक नीति की बैठकों से पहले वित्त मंत्री और वरिष्ठ नौकरशाहों से मिलने वाला एमपीसी का एकमात्र सदस्य होता है। एमपीसी के अन्य सदस्यों के लिए वित्त मंत्रालय लिखित में अपने विचार भेजेगा।
 
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'ब्याज दरों की बैठकों से पहले आरबीआई गवर्नर की वित्त मंत्री से मुलाकात सम्मानित और ईष्र्या रहित परंपरा रही है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकार की तरफ से कोई अवांछित दबाव या हस्तक्षेप का इस्तेमाल नहीं किया गया।' सरकार के कुछ अहम हलकों का नजरिया यह है कि वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का एमपीसी के सभी सदस्यों से मिलने की कोई जरूरत नहीं है। पिछले साल एमपीसी के गठन के बाद से वित्त मंत्रालय का यह मानना था कि एक ऐसा मंच तैयार करने की जरूरत है, जहां सरकार सभी एमपीसी सदस्यों के समक्ष अपने विचार रख सके। इसे ध्यान में रखते हुए तीन सदस्यों का एक अनौपचारिक समूह बनाया गया, जिसमें आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास, मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन और प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल को शामिल किया गया। 
 
इस समूह की एमपीसी के तीन स्वतंत्र सदस्यों- पमी दुआ, चेतन घाटे और रवींद्र ढोलकिया से मुलाकात नई दिल्ली में 1 जून को होनी थी। इसके अलावा समूह की आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल, डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य और कार्यकारी निदेशक माइकल पात्रा समेत सभी 6 सदस्यों से 2 जून को बैठक होनी थी। नई प्रणाली के तहत ये बैठकें पहली बार होने जा रही थीं। 
 
पिछले महीने बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ साक्षात्कार में सुब्रमण्यन ने वित्त मंत्रालय के तीन सदस्यीय समूह की जरूरत को तर्कसंगत ठहराया था। उन्होंने कहा था, 'अधिनियम (वित्त अधिनियम 2016) स्पष्ट रूप से कहता है कि सरकार को मौद्रिक नीति समिति को सुुझाव देने का हक होना चाहिए। यह समूह उसके मुताबिक ही है... याद रखिए, ये सुझाव हैं, हम उन पर दबाव नहीं डालते हैं। वे हमारे सुझावों पर विचार करने या न करने को लेकर स्वतंत्र हैं। हम मौद्रिक नीति की बैठकों से पहले उनसे अपनी राय पेश करने के लिए मिलेंगे।' दास 31 मई को सेवानिवृत्त हो गए और सान्याल आधिकारिक कार्य को लेकर देश से बाहर थे। 
 
यह माना जा रहा है कि दास की जगह कंपनी मामलों के सचिव तपन राय लेने वाले थे। राय के पास आर्थिक मामलों के विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी है। इसलिए ये बैठकें आयोजित करने का जिम्मा सुब्रमण्यम पर आ गया। हालांकि सुब्रमण्यन को आरबीआई ने 1 जुलाई को यह सूचित किया कि ऐसी कोई बैठक नहीं होगी और सरकार के जो विचार हैं, वे एमपीसी को लिखित में दिए जाएं। 
 
बैठकों के लिए तैयार खिए गए प्रस्तुतिकरण समेत पूरी सामग्री केंद्रीय बैंक को ई-मेल की गई। इसके बजाय पटेल 2 जून को खुद दिल्ली आकर वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिले। 7 जून को एमपीसी ने लगातार चौथी बार ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने का फैसला किया। केंद्रीय बैंक ने पिछली कटौती अक्टूबर 2016 में की थी। उस समय रीपो दर में 25 आधार अंक की कमी की गई थी। 
 
अप्रैल में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई 3 फीसदी से नीचे रही है और जनवरी-मार्च तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 6.1 फीसदी रही है, इसलिए दरों में कटौती को लेकर वित्त मंत्रालय की आवाज तेज हुई है। अधिकारियों ने कहा कि 1 और 2 जून को बैठकों को टालकर एमपीसी और पटेल ने परंपरा को लेकर अपनी प्राथमिकता साफ कर दी है। इसके बाद सुब्रमण्यन द्वारा जारी बयान में एमपीसी के मुद्रास्फीति मॉडल की आलोचना की गई। इससे रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय का विवाद सामने आ गया। हालांकि सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय इस विवाद में नहीं पड़ेगा। 
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