दिवालिया मामले, समाधान नहीं आसान

अनूप रॉय और अभिजित लेले | मुंबई Jun 14, 2017 09:43 PM IST

दिवालिया प्रक्रिया के लिए केंद्रीय बैंक ने हालांकि 12 बड़े खातों की पहचान की है और बैंकों को 500 और खातों के लिए समाधान की प्रक्रिया पर काम करने का निर्देश दिया है, लेकिन बैंकरों का कहना है कि मौजूदा तंत्र दिवालिया के प्रभावी समाधान के लिए तैयार नहीं है। बैंकरों को इसके समाधान की राह में नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में अड़चन की संभावना दिख रही है क्योंकि व्यवस्था इसके प्रति अभ्यस्त हो रहा है। कई प्रवर्तक इस बाबत कानूनी संघर्ष शुरू कर सकते हैं, जिससे इसकी समयसीमा को झटका लग सकता है।
 
केंद्रीय बैंक ने जिन 12 मामलों की पहचान की है उसमें निश्चित तौर पर तेजी आएगी, लेकिन प्रभावी माहौल के लिए सरकार और केंद्रीय बैंक को कुछ और कदम उठाने होंगे। उदाहरण के लिए देश में दिवालिया मामलों पर काम करने वाले प्रोफेशनल्स पर्याप्त संख्या में नहीं हैं और सूचना मुहैया कराने वाली कोई कंपनी भी नहीं है। ऐसी कंपनियां उधार लेने वाली फर्मों के आंकड़े उपलब्ध कराती है और इसका इस्तेमाल दिवालिया प्रक्रिया में हो सकता है। दिवालिया संहिता में 180 दिन से 270 दिन के बीच समाधान निकालने की परिकल्पना की गई है, जो मौजूदा न्यायिक ढांचे पर भारी दबाव बढ़ाएगा।
 
दिवालिया प्रक्रि याओं के खेल में कानूनी व्यवस्था व एनसीएलटी नई चीज है। मुंबई के एक सरकारी बैंक के रिकवरी प्रमुख ने कहा, ट्रिब्यूनल के पास जब मामला पहुंचेगा तो हमें अनायास ही कुछ मुश्किलें देखने को मिल सकती है। डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल का अनुभव स्पष्ट तौर पर निराशाजनक है, जिन्हें समय सीमा के भीतर फैसला देना होता है। कुल 33 डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल हैं और पांच डेट रिकवरी अपीलीय ट्रिब्यूनल (जहां फैसले को चुनौती दी जा सकती है), लेकिन ऐसे ट्रिब्यूनल में न्यायाधीशोंं की संख्या कम है।
 
कई वजहों से देरी होती है मसलन अपर्याप्त कर्मचारी व बुनियादी ढांचा और बार-बार मामले का स्थगन। डीआरटी के पास काफी लंबित मामले हैं। यह जानकारी एक सरकारी बैंक के अधिकारी ने दी। काफी ज्यादा संपत्तियोंं का मालिकाना हक दांव पर है, लिहाजा प्रवर्तक व मालिक आसानी से नियंत्रण नहीं छोडऩे वाले। बैंकरों को लगता है कि बड़े मामले में कानूनी संघर्ष हो सकता है।
 
रेटिंग एजेंसी इक्रा ने कहा कि ऐसे फैसलों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लिहाजा प्रक्रिया में देरी होगी। हालांकि ऐसे दृष्टांत हैं जहां देनदार ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। बैंकरों को अतिरिक्त प्रावधान के बोझ की चिंता है, जब आय में बढ़त की रफ्तार कमजोर है और पुराने फंसे कर्ज की लागत काफी ऊंची है। प्रावधान के समायोजन के लिए बैंक और वक्त चाहते हैं। लेनदार आरबीआई से प्रावधानों को कई तिमाहियों में फैलाने की मांग पहले ही कर चुके हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि 12 खातों के लिए 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त प्रावधान करना होगा। जिन खातों की आरबीआई ने पहचान की है उसकी हिस्सेदारी 7.11 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित गैर-निष्पादित आस्तियों में एक चौथाई है। इसका मतलब यह हुआ कि ये करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये के लिए जिम्मेदार हैं।
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