बीओबी व केनरा का विलय होगा सही

हंसिनी कार्तिक और अभिजित लेले | मुंबई Jun 16, 2017 09:45 PM IST

पिछले साल इसी समय जब सरकारी बैंकों के एकीकरण की बात जोर पकड़ी थी तब सरकारी बैंकों के शेयरों पर इसका सकारात्मक असर दिखा था, जिससे उनके मूल्यांकन की दोबारा रेटिंग हो गई थी। विलय की बात दोबारा हो रही है और इससे जुड़ी रिपोर्ट बताती है कि बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी), देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र का संभावित तौर पर विलय हो सकता है। ये सभी बैंक अपने कारोबार का बड़ा हिस्सा पश्चिम भारत से हासिल करते हैं। इसी तरह दक्षिण भारत के बैंकों की बात करें तो विजया बैंक और सिंडिकेंट बैंक का विलय केनरा बैंक के साथ होने की बात हो रही है।
 
विलय प्रक्रिया जोर पकडऩे के साथ निवेशकों को सरकारी बैंकों के शेयरों पर नजर डालनी चाहिए, जो एक बार फिर एक्सचेंजों पर सक्रिय हो रहे हैं।  इस बार एकीकरण को लेकर माहौल मिश्रित नजर आ रहा है। विलय के मामले में क्षेत्रवार विलय अहम होगा। मार्च तिमाही में बैंक ऑफ बड़ौदा, केनरा बैंक, भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नैशनल बैंक ने मजबूत शुद्ध लाभ अर्जित किया, ऐसे में विश्लेषकों का एक वर्ग प्रस्तावित एकीकरण के समय पर सवाल उठा रहा है। उन्हें डर है कि बड़े बैंकों की तरफ से छोटे का अधिग्रहण उनकी आय की क्षमता पर चोट करेगा।
 
विदेशी ब्रोकरेज क्रेडिट सुइस ने एक नोट में कहा कि विलय होगा तो बड़े सरकारी बैंकों पर कमजोर छोटे बैंकों को उबारने वाला बनने का जोखिम होगा। इससे उनके वित्तीय व शेयर के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। नोमूरा के विश्लेषकों ने कहा कि बड़े बैंकों के साथ कमजोर बैंकों के विलय (जहां त्वरित उपचारात्मक कदम उठाए जा चुके हैं) विलय के बाद बनने वाली इकाई की बढ़त को पीछे खींचेगा और बड़े बैंकों को ज्यादा पूंजी की दरकार होगी।
 
एकीकरण की खबर के बाद गुरुवार को बैंक ऑफ बड़ौदा व केनरा बैंक का शेयर 1-2 फीसदी टूटा, वहीं विजया बैंक, देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 1.5-4 फीसदी तक की गिरावट आई। एडलवाइस सिक्योरिटीज के अध्यक्ष व मुख्य कार्याधिकारी विकास खेमानी ने कहा, बेहतरी के लिए जो करने की दरकार है उसे कर देना चाहिए और इस मामले में समय नहींं देखना चाहिए। 
 
खेमानी का भरोसा प्रस्तावित विलय के जरिए सरकारी बैंकों के कारोबारी परिचालन के एकीकरण से मिलने वाले फायदे से उपजा है, खास तौर से देनदारी या जमा के लिहाज से उनकी शक्तियों को लेकर। बैंकिंग उद्योग चालू व बचत खाते की जमाओं की हिस्सेदारी में उछाल देख रहा है, ऐसे में सरकारी बैंकों के जमाओं के आधार को एकीकृत करना महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि निजी क्षेत्र के बैंकों ने जमाओं की रफ्तार में तेज उछाल दर्ज की है।
 
2016-17 में कुल बैंकिंग जमाओं में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 69 फीसदी रही जबकि 2009-10 में यह 78 फीसदी रही थी। इस तरह से बाजार हिस्सेदारी में लगातार नुकसान हुआ। कर्ज की बढ़त की रफ्तार निजी क्षेत्र के बैंकों की बेहतर रही क्योंकि उनमें खुदरा ग्राहकों को आकर्षित करने की ज्यादा क्षमता है। बैंक के एक अधिकारी ने कहा, अगर सरकार बाजार हिस्सेदारी में हो रहे नुकसान पर लगाम कसना चाहती है तो एकीकरण अनिवार्य है।
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