झांसे से बिक्री, इससे तो ना रुकनी

संजय कुमार सिंह |  Jun 29, 2017 10:09 PM IST

ग्राहकों को बरगलाकर या झांसा देकर बेवजह की वित्तीय योजनाएं बेचने की घटनाएं लगातार होती रहती हैं। तमाम खबरों और शिकायतों के बाद भी गलत तरीके से वित्तीय योजनाओं की बिक्री करने वालों का कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन लगता है कि अब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस ओर गंभीरता से ध्यान दे रहा है। बैंकिंग लोकपाल योजना, 2006 में हाल में संशोधन के जरिये बैंकिंग नियामक ने कहा है कि जिन ग्र्राहकों को बरगलाकर या झांसा देकर थर्ड पार्टी प्रोडक्ट यानी तीसरे पक्ष की बीमा और म्युचुअल फंड जैसी योजनाएं बेची गई हैं, उन्हें 1 लाख रुपये तक  मुआवजा दिया जा सकता है। यह मुआवजा ऐसी योजनाओं पर खर्च, समय की बरबादी और उत्पीडऩ के बदले दिया जाएगा। रिजर्व बैंक ने बैंकिंग लोकपाल द्वारा दिया जाने वाला अवार्ड भी 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दिया है। हालांकि उपभोक्ताओं अधिकारों के लिए काम करने वाले लोगों और वित्तीय योजनाकारों का मानना है कि लोकपाल के अधिकार बढ़ाने भर से परेशान ग्राहकों को बहुत अधिक राहत नहीं मिलेगी। उनके निराशा भरे आकलन की वजह दरअसल बैंकिंग लोकपाल का खराब प्रदर्शन और खस्ता रिकॉर्ड है।  

 
बैंकिंग लोकपाल योजना की 2015-16 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार लोकपाल के 15 कार्यालयों को इस दौरान करीब 102,894 शिकायतें मिलीं। इस अवधि में लोकपाल ने महज 15 अवार्ड जारी किए गए। इंटरनैशनल कंज्यूमर राइट्स प्रोटेक्शन काउंसिल (आईसीपीआरसी) के अध्यक्ष अरुण सक्सेना कहते हैं,'बहुत ही कम मामले हैं, जिनमें ग्राहकों के पक्ष में फैसले दिए गए हों। ज्यादातर मामले कमजोर आधार पर खारिज कर दिए जाते हैं।' 
 
सक्सेना कहते हैं कि बैंकिंग लोकपाल आम तौर पर बैंक का ही एक अधिकारी होता है, जो बैंकों के खिलाफ फैसले देेने से कतराता है। बैंकिंग लोकपाल के यहां ग्राहक अक्सर समय बर्बाद करते हैं। कई बार तो एक-एक साल तक। अंत में थक हार कर ग्राहक को उपभोक्ता न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है। कभी-कभी तो जिन लोगों की लोकपाल के तौर पर नियुक्ति होती हैं, उनके पास इस पद से संबंधित  आवश्यक जानकारी नहीं होती। उनमें ऐसे ऑफिस में किस तरह काम किया जाता है, इससे संबंधित प्रशिक्षण का भी अभाव होता है।
कंज्यूमर गाइडेंस सोसाइटी ऑफ इंडिया के मानद सचिव एम एस कामत कहते हैं, 'उन लोगों को कानूनी और सबूत जुटाने की प्रक्रिया का व्यावहारिक ज्ञान भी नहीं होता है।' इस सिलसिले में कामत एक उदाहरण देते हें। मान लीजिए कि किसी बैंक का कोई ग्राहक एटीएम से रकम निकालने की कोशिश करता है। उसके खाते से रकम तो कट जाती है पर रकम नहीं मिलती है। इसके बाद ग्राहक लोकपाल में शिकायत दर्ज करता है। 
 
कामत कहते हैं, 'लगभग एक महीने तक ग्राहक को इंतजार कराने के बाद लोकपाल का अक्सर यह रवैया होता है कि अगर बैंक कह रहा है कि भुगतान कर दिया गया है तो इस मामले में हम  कुछ नहीं कर सकते। इसके बाद मामला बंद कर दिया जाता है। ऐसे में ग्राहक के पास अदालत जाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं रह जाता।' वह कहते हैं कि ग्राहक की शिकायत मिलने के तुरंत बाद बाद बैंक को घटना के दो दिन पहले और पांच दिन बाद तक के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखना चाहिए, लेकिन अक्सर ऐसा नहीं किया जाता है। उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों का सुझाव है कि बैंक लोकपाल का सदस्य बैंकिंग जगत से नहीं होना चाहिए बल्कि उसकी जगह सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त किया जाना चाहिए। सक्सेना का मानना है कि परेशान ग्राहक को सीधे उपभोक्ता अदालत जाना चाहिए, जहां उसे न्याय और मुआवजा मिलने के बेहतर आसार होते हैं। 
 
वित्तीय योजनाकारों का कहना है कि ग्राहक की अपनी खुद की जानकारी ही उसे झांसा देकर वित्तीय योजनाएं खरीदने से बचा सकती है। सेबी के पास पंजीकृत निवेश सलाहकार पर्सनलफाइनैंस प्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'अगर कोई वरिष्ठï नगारिक फिक्स्ड डिपॉजिट खोलने के लिए बैंक जाता है और वहां रिलेशनशिप मैनेजर उस पर बीमा योजना खरीदने के लिए दबाव डालता है तो ऐसे में योजना खरीदने से इनकार करने की जिम्मेदारी ग्राहक की बनती है।' राघव का कहना है कि एक बार बीमा कागजात पर दस्तखत करने के बाद ग्राहक के लिए यह साबित करना मुश्किल होगा कि उसे गलत जानकारी देकर और बरगलाकर बीमा योजना बेची गई है। भले ही 20 लाख रुपये की रकम बड़ी दिखती हो मगर बैंकों के लिए यह मामूली रकम है और इससे शायद ही उन पर कोई असर होगा। हालांकि आरबीआई का कदम सही दिशा में जरूर है, लेकिन इससे ग्राहकों की परेशानी शायद ही दूर हो। ग्राहकों को चाहिए कि किसी भी तरह की झांसा बिक्री से बचने के लिए वे वित्तीय योजनाओं के संबंध में अपनी जानकारी दुरुस्त रखें या फिर किसी भरोसेमंद व्यक्ति की सलाह पर ही चलें। 
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