कैसे चलेगा आचार्य का सुदर्शन चक्र

अनूप रॉय और कृष्णकांत | मुंबई Sep 08, 2017 09:46 PM IST

रेटिंग एजेंसियों के अधिकारी और विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का यह सुझाव सही है कि सरकारी बैंकों को पूंजी देने की जरूरत है लेकिन इस पर अमल करना एक बड़ी चुनौती होगी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक फंसे हुए कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं साथ ही उच्च प्रावधान जरूरतों की वजह से उनके बैलेंसशीट पर असर दिख रहा है। 
 
गुरुवार को आचार्य ने कई सवाल उठाते हुए संकटग्रस्त सरकारी बैंकों की वित्तीय सेहत सुधारने के लिए पूंजी देने की नई योजना का सुझाव दिया। आचार्य ने कहा कि सुदर्शन चक्र योजना से बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत होगी जो वर्ष 2015 में लाई गई इंद्रधनुष योजना से अच्छी होगी। उनका कहना था कि सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपनी हिस्सेदारी कम कर 52 फीसदी तक करनी चाहिए ताकि बाकी पूंजी बाजार से जुटाई जा सके। कर्ज फंसने के डर से और पूंजी पर्याप्तता अनुपात कम होने की वजह से सरकार बैंकों की कॉरपोरेट क्षेत्र के ग्राहकों को नए कर्ज देने की क्षमता पर असर पड़ा है। 
 
आलोचकों का कहना है कि आचार्य के सुझावों में कई समस्याएं हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के अलावा सरकारी बैंकों के शेयरों के बड़े खरीदार नहीं हैं। एक विश्लेषक का कहना है, 'सरकारी बैंक में अल्पांश शेयरधारक बनने का कोई फायदा नहीं है जिसका संचालन पुराने ढर्रे पर ही होना है। अगर हिस्सेदारी 24 फीसदी तक कम होती है तो लोग दिलचस्पी दिखा सकते हैं।' रेटिंग एजेंसी के एक अधिकारी का कहना है, 'ऐसा नहीं है कि बैंक कोशिश नहीं कर रहे। जब भी हमारी उनके मुलाकात होती है वे कहते हैं कि अगली तिमाही में हम पूंजी जुटाएंगे ऐसे में आपको हमारी रेटिंग कम नहीं करनी चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रबंधन पूंजी जुटाने के लिए काफी कोशिश कर रहा है लेकिन इसमें उन्हें सफलता नहीं मिल रही है।'
 
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि आचार्य का यह सुझाव काफी दिलचस्प है कि सरकारी बैंकों के लिए जमाएं जुटाने वाले शाखाओं के नेटवर्क की बिक्री की जाए। इसकी वजह यह है कि कई निजी और विदेशी बैंक अपनी शाखाओं का विस्तार धीरे-धीरे करने के बजाए एक बार में ऐसी 50-60 शाखाएं खरीदने में दिलचस्पी दिखाएंगे। एक विश्लेषक कहते हैं, 'सरकारी बैंक अच्छी तरह स्थापित हैं और इनकी पहुंच गहरी है। ये शाखाएं किसी भी शहर का हिस्सा हैं। अगर इन शाखाओं को खरीद लिया जाता है तो इससे तुरंत ही नए बैंकों को जमाएं मिलना शुरू हो जाएगा।' हालांकि इस कदम को आम लोगों में गलत तरीके से परिभाषित हो सकता है कि सरकारी बैंक निजी बैंकों को बेचा जा रहा है जो राजनीतिक रूप से काफी जोखिम वाला कदम साबित हो सकता है।
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