पूंजी देना नहीं है समाधान पर इसे टाला नहीं जा सकता

जयदीप घोष |  Oct 25, 2017 10:10 PM IST

बीएस बातचीत

सरकार ने मंगलवार को बैंकों को 2.11 लाख करोड़ रुपये की भारी भरकम पूंजी देने का ऐलान किया है, ऐसे में नकदी की कमी का सामना कर रहे कई बैंको को इससे आसानी होगी। भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्व डिप्टी गवर्नर उषा थोराट ने कहा कि पूंजी दिए जाने से बैंकों को गैर-निष्पादित आस्तियों के समाधान में मदद मिलेगी। थोराट ने जयदीप घोष को दिए साक्षात्कार में कहा कि सरकार को इन बैंकों में तत्काल पेशेवर प्रबंधन, स्वायत्तता और ज्यादा जवाबदेही कायम करना चाहिए। मुख्य अंश... 

पीएसबी के पुनर्पूंजीकरण पैकेज पर आपकी शुरुआती प्रतिक्रिया?

यह बड़ा कदम है क्योंकि सरकारी बैंकों को दोबारा सही तरीके से काम शुरू करने के लिए यह जरूरी था। कुछ समय से कुछ भी नहीं हो रहा था। दूसरी ओर, संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा शुरू किए जाने, नियमों में सख्ती की काफी दरकार थी, लेकिन यह सरकारी बैंकों की क्रेडिट डिलिवरी व्यवस्था को अवरोधित कर रहा था। इन बैंकों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत न्यूनतम पूंजी की जरूरत से कम रखने की अनुमति नहीं दी गई। ऐसे में यह तार्किक परिणाम था। साथ ही हर साल आम बजट में 10,000 करोड़ रुपये या 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किए जाने के बजाय 2.11 लाख करोड़ रुपये की बड़ी रकम सरकारी बैंकों को आगे बढ़ाएगा।

क्या अन्य विकल्प थे, जिस पर सरकार को नजर डालना चाहिए था?

मुझे नहीं लगता कि निजीकरण के अलावा अन्य विकल्प थे। इसके लिए भी कुछ पूंजी की जरूरत होती ताकि बैंकों का खाता-बही सुधरे। चूंकि सरकारी बैंकों के पास 80 से 85 फीसदी कारोबार है, पर ऐसी स्थिति जारी रखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि यह बात भी हो रही है कि पूंजी की जरूरत थी, लेकिन यह रामबाण नहीं है। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि क्रेडिट आवंटन की व्यवस्था में बदलाव न हो और बुद्धिमत्ता के साथ इसका फैसला लिया जाए। पेशेवर प्रबंधन की तैनाती भी काफी महत्वपूर्ण है। बैंकों को ज्यादा स्वायत्तता मिलनी चाहिए और इन्हें ज्यादा जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। पूंजी उपलब्ध कराने से शुरुआत भर हुई है और सभी अन्य कदम मसलन पेशेवर रवैया, बेहतर प्रशासन और ज्यादा स्वायत्तता आदि की दरकार है।

कंपनियों को उधार देने के मामले में यह पीछे है। पूंजी दिए जाने के बाद क्या इसमें तेजी आएगी?

कंपनियों की उधारी में तत्काल बढ़ोतरी शायद नहीं होगी। यह कंपनियों की बैलेंस शीट पर दबाव और उधारी की मांग पर निर्भर करती है। हालांकि सरकार का ध्यान छोटे व मझोले उद्यमों को ज्यादा उधार देने पर है। 10 लाख रुपये, 20 लाख रुपये या 1 करोड़ रुपये के कर्ज में इस कदम से निश्चित तौर पर तेजी आएगी। निजी क्षेत्र के बैंकों व एनबीएफसी की उधारी की रफ्तार पहले से ही अच्छी है। सरकारी बैंक निश्चित तौर पर इस मौके का इस्तेमाल इस क्षेत्र को उधारी की दोबारा शुरुआत करने के लिए कर सकते हैं।

क्या इसका मतलब यह हुआ कि बैंकों के विलय का मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा?

पैकेज की घोषणा के समय हमने बैंकों के विलय पर कुछ भी नहीं सुना। यहां तक कि प्रदर्शन के साथ पैकेज का जुड़ाव भी बहुत स्पष्ट नहीं है। विलय के साथ उनकी समस्याएं आएंगी। विलय के दौरान कारोबार करीब-करीब ठप हो जाएगा। ऐसे में शायद कहा जा सकता है कि पूंजी मिलने के बाद बैंकों में कारोबारी रफ्तार पकड़ेगी। त्वरित उपचारात्मक कदम वाले बैंकों को प्राथमिकता का संदर्भ था, लेकिन यह स्पष्ट नहींं है।

यह एक तरह से स्वीकार्यता है कि एनसीएलटी के जरिए एनपीए के समाधान में लंबा वक्त लगेगा, जिसमें बैंकों को बड़ी रकम बट्टे खाते में डालनी पड़ सकती है?

मुझे ऐसा नहीं लगता। पूंजी दिया जाना जरूरी था और यह बैंकों को जरूरी रकम बट्टे खाते में डालने जैसे कदम का सामना करने की ताकत दे सकता है।

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