'रिजर्व बैंक की दूसरी सूची में हमारा 6,500 करोड़ रु. का निवेश'

सोमेश झा और इंदिवजल धस्माना |  Dec 31, 2017 10:43 PM IST

बीएस बातचीत

बैंकिंग क्षेत्र भले ही एनपीए जैसी तमाम समस्याओं से जूझ रहा हो लेकिन पंजाब नैशनल बैंक के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी सुनील मेहता इससे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार दिख रहे हैं। सोमेश झा और इंदिवजल धस्माना से बातचीत में मेहता ने भविष्य की रणनीतियों और परिचालन को युक्तिसंगत बनाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में चर्चा की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश : 

सरकार द्वारा 50,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त उधारी जुटाने की घोषणा के बाद चौथी तिमाही में आपकी ट्रेजरी आय कैसी रहेगी?

चौथी तिमाही में ट्रेजरी आय पर थोड़ा दबाव दिखेगा। यह पहले की तरह नहीं रह सकता है क्योंकि ट्रेजरी आय का सीधा संबंध ब्याज दर परिदृश्य से होता है।

आरबीआई द्वारा जारी एनपीए की दूसरी सूची में आपने कितना निवेश किया है?

दूसरी सूची में 28 मामले शामिल हैं जिसमें से 20 मामलों से हमारा बैंक संबंधित है। इनके लिए 6,500 करोड़ रुपये का निवेश और 800 करोड़ रुपये के वृद्धिशील प्रावधान की जरूरत है। इसमें से सितंबर तक 75 करोड़ रुपये पहले ही मुहैया कराए जा चुके हैं और इसलिए 725 करोड़ रुपये बाकी है। आरबीआई ने कहा है कि यदि आप इन मामलों को खुद निपटाने में समर्थ हैं तो कोई बात नहीं, अन्यथा आपको एनसीएलटी के पास जाना पड़ेगा। यदि कोई बात नहीं बनती है और मामला एनसीएलटी के पास जाता है यानी सबसे खराब स्थिति में भी हमारा अतिरिक्त प्रावधान 725 करोड़ रुपये का रहेगा जिसे हम आसानी से निपटा सकते हैं।

क्या दूसरी सूची के मामलों को आप द्विपक्षीय तरीके से निपटाना चाहते हैं?

हां, हम कुछ मामलों को द्विपक्षीय तरीके से भी निपटा सकते हैं। लेकिन इसकी संख्या काफी कम यानी 4 से 5 हो सकती है। हम 20 मामलों से जुड़े हैं और इनमें से किसी भी मामले में हम प्रमुख बैंकर नहीं हैं।

12 मामलों की पहली सूची में आपका कितना निवेश था और उन खातों के लिए आप क्या कर रहे हैं?

पहली सूची के 12 मामलों में से 9 मामलों में हमारा करीब 11,000 करोड़ रुपये का निवेश था। इस 11,000 करोड़ रुपये के लिए हमें चालू वित्त वर्ष के दौरान 1,080 करोड़ रुपये के वृद्धिशील प्रावधान करने की आवश्यकता थी। सितंबर तक इसमें से 830 करोड़ रुपये मैंने पहले मुहैया करा दिया है। इसका मतलब साफ है कि हमने प्रावधान को काफी हल्का कर दिया है। यानी अब हमारा बकाया महज 250 करोड़ रुपये है जो हमारे लिए काफी सहज है।

एनसीएलटी के जरिये निपटाये जा रहे कुछ मामलों में लेनदारों ने काफी छूट दी है। आप कितनी कटौती करना चाहते हैं?

अब चाहने का सवाल ही नहीं है। यह जो भी निर्णय आएगा उसकी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। इसलिए फिलहाल इसके बारे में कुछ भी बताना कठिन है क्योंकि हरेक मामला अनोखा है। लेकिन सामान्य आकलन से पता चलता है कि पहली सूची के हमारे 9 मामलों में अधिकांश रकम - 9,000 करोड़ रुपये - 5 इस्पात कंपनियों के मामलों से संबंधित है। ये सभी पांच इस्पात परिसंपत्तियां अभिरुचि पत्र (ईओआई) और बोली प्रक्रिया के उन्नत चरण में पहले ही पहुंच चुकी हैं। साथ ही इनके लिए काफी ईओआई और बोलियां भी प्राप्त हुई हैं। मुझे उम्मीद है कि हमें एक बेहतर समाधान मिलेगा और अधिक कटौती नहीं करनी पड़ेगी।

बोली प्रक्रिया में प्रवर्तकों पर नकेल कसने के लिए ऋण शोधन एवं दिवालिया संहिता में किए गए हालिया संशोधन से बोली प्रक्रिया कहां तक प्रभावित होगी?

निश्चित तौर पर मूल्यांकन को लेकर चुनौतियां बढ़ेंगी लेकिन यह उनके लिए एक अच्छा संकेत है जो वित्तीय अनुशासन पर अमल नहीं करते हैं। मूल्यांकन पर इसका आंशिक असर दिखेगा लेकिन दीर्घावधि में कंपनियों को इससे अच्छा संकेत मिलेगा कि यदि आप प्रदर्शन नहीं करेंगे, वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करेंगे तो आप परिसंपत्तियों को बरकरार नहीं रख पाएंगे।
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