बैंकों में सुस्त नियंत्रण के लिए लोग जिम्मेदार

अनूप रॉय और निकहत हेटावकर | मुंबई Feb 15, 2018 09:55 PM IST

सुस्ती का खामियाजा

► लगभग 70 प्रतिशत बैंकिंग प्रणाली सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा है नियंत्रित
इसके अलावा मौजूदा समय में पीएसबी से जुड़ रहे कर्मचारियों की गुणवत्ता और कुशलता भी नहीं है ज्यादा अच्छी
पीएसबी के कर्मचारियों को चुकाया जाने वाला वेतन बेहद कम है, जिससे वे करियर के लिए इनमें आना पसंद नहीं करते

पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में सामने आई धोखाधड़ी ने एक बार फिर से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) में कमजोर प्रक्रियाओं और प्रणालियों को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। हालांकि बैंकों का कहना है कि इसकी कई वजह हैं कि हमेशा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही क्यों प्रभावित होते हैं जबकि निजी और विदेशी बैंक बेहद कार्य-कुशल समझे जाते हैं। मुख्य बात यह है कि बड़े आकार की वजह से भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक धोखाधड़ी का पता लगाने में जल्द सफल नहीं हो पाते हैं। लगभग 70 प्रतिशत बैंकिंग प्रणाली सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा नियंत्रित है और इतने बड़े आकार की वजह से इन बैंकों कई धोखाधड़‍ियों की आशंका पैदा हो जाती है।

ये बैंक (पीएसबी) देश के हरेक नुक्कड़ और कोने पर मौजूद हैं और इन्हें संचालित करने वाले लोग इतने अत्याधुनिक और कुशल नहीं हो सकते हैं। बैंकरों का कहना है कि इन बैंकों में कई कार्य अभी भी मैनुअली (बगैर कम्प्यूटर के) किए जाते हैं और इससे खामियां बढऩे लगती हैं।  इसके अलावा मौजूदा समय में पीएसबी से जुड़ रहे कर्मचारियों की गुणवत्ता और कुशलता भी ज्यादा अच्छी नहीं है और इन्हें चुकाया जाने वाला वेतन बेहद कम है। उदाहरण के लिए, किसी पीएसबी में क्लर्क को मासिक तौर पर 20,000 रुपये मिलते हैं जबकि प्रोबेशनरी अधिकारी का वेतन 30,000 रुपये से शुरू होता है। इसलिए, अच्छी गुणवत्ता वाले लोग करियर के तौर पर बैंकों में आने के लिए इच्छुक नहीं हैं। इसके अलावा, कई कर्मचारी निजी क्षेत्र के बैंकों में चले जाते हैं, जहां उन्हें अच्छी वृद्धि का मौका मिलता है, भले ही वहां उन्हें ज्यादा दबाव में काम करना पड़ता है।

सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'शुरू में बैंकिंग एकमात्र पसंदीदा विकल्प था और अब करियर के लिहाज से यह आखिरी पसंद बन गया है। हमारा मानना है कि स्टाफ का जोश अब काफी कम हो गया है।' अधिकारी ने कहा, 'शाखाओं की प्राथमिकताएं मुख्य कार्यालय की तुलना में काफी अलग हैं। यह नियम है कि हमें हर किसी स्टाफ को दो वर्षीय प्रशिक्षण के लिए भेजना पड़ता है। लेकिन यदि मैं गणक जैसी जिम्मेदारी संभालने वाले किसी कर्मचारी को प्रशिक्षण के लिए भेजता हूं तो इससे कई दिनों तक मेरा परिचालन प्रभावित होगा। इस वजह से प्रशिक्षण की प्रभावी व्यवस्था कभी नहीं हो पाती है।' भले ही प्रशिक्षण को पूरा किया जाता है, लेकिन इसे लेकर ज्यादा गंभीरता नहीं दिखाई जाती।

अधिकारी ने कहा, 'मुझे एक विदेशी स्थान पर एक सप्ताह के प्रशिक्षण पर भेजा गया था। यह एक तरह से पिकनिक जैसा था।' इसके अलावा बैंकों के विदेशी कार्यालयों में व्यवसाय की गुणवत्ता को लेकर कई समस्याएं हैं। इसकी एक वजह यह है कि वहां बैंक की शाखा का ज्यादा दबदबा नहीं होता है और शाखा प्रबंधक पर काफी दबाव रहता है। इस वजह से बैंक को कमजोर गुणवत्ता वाले ग्राहकों के साथ व्यवसाय करना पड़ता है जिसे अन्य प्रतिष्ठित स्थानीय बैंकों द्वारा खारिज कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में धोखाधड़ी या कर्ज फंसने की आशंका हमेशा बनी रहती है। 

बैंकरों का यह भी कहना है कि यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के व्यवसाय की यही प्रवृत्ति है जिससे धोखाधड़ी होने की आशंका पैदा हो जाती है। उदाहरण के लिए, निजी बैंक रिटेल केंद्रित हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कॉरपोरेट-केंद्रित हैं। देश का बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक, पीएनबी, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ इंडिया हजारों करोड़ रुपये का कर्ज दे सकते हैं, लेकिन निजी क्षेत्र के छोटे बैंक अपनी बैलेंस शीट के सीमित आकार को देखते हुए इतना कर्ज नहीं दे सकते। इसलिए जब इन कंपनियों में धोखाधड़ी होती है या कर्ज फंसता है तो इसका आकार हमेशा ही बड़ा होता है।

इसके अलावा अंडरराइटिंग के चलन से जुड़े मसले भी हैं, जो हर बैंक के अलग-अलग हैं। एसबीआई के पूर्व चेयरमैन प्रतीप चौधरी ने कहा, यह समय सभी बैकों को एक ही चश्मे से देखने का नहीं है। एसबीआई कभी भी इस तरह का कर्ज नहीं देगा जो अन्य बैंक देने को राजी होंगे। चौधरी ने कहा, बैंक की संस्कृति भी अलग है। एसबीआई ने अपनी संस्कृति विकसित की है, प्रशिक्षण की बेहतर व्यवस्था है, ज्यादा जवाबदेही है, जो अन्य बैंकों में नहीं पाया जाता। उन्होंने कहा कि प्राइवेट बैंक भी धोखाधड़ी का सामना करते हैं और पीएनबी जैसे मामले में अगर गारंटी बैंक की व्यवस्था को जानकारी दिए बिना दी गई है तो ऐसी धोखाधड़ी को रोकना काफी मुश्किल काम है। ऐसे में लोग बैंक चलाते हैं न कि प्रक्रिया चलाती है और वही गड़बड़ी रोक सकते हैं। लेकिन प्रक्रिया को ज्यादा सख्त बनाने से भी बैंक को सही तरीके से काम करना मुश्किल होगा।
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