एलओसी को क्यों तरजीह देते हैं घोटालेबाज

बीएस संवाददाता |  Feb 19, 2018 09:57 PM IST

क्या है एलओयू?
 
पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले ने एक ऐसे माध्यम को सुर्खियों में ला दिया है जिसका एशिया और अफ्रीका एवं दक्षिणी अमेरिका के तमाम विकासशील देशों में अंतरराष्टï्रीय वित्तीय लेनदेन में काफी इस्तेमाल होता है। इसे लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) या लेटर ऑफ क्रेडिट (एलसी) कहा जाता है जो मुख्य तौर पर एक बैंक गारंटी है। एलओयू किसे जारी किया गया है और बैंक के साथ उसकी क्या बातचीत हुई है, इस पर ध्यान दिए बिना उसे चुका दिया जाता है। आयातक एलओयू लेता है और उसके जरिये क्लाइंट की तरजीही मुद्रा में भुगतान करता है जो आमतौर पर चार प्रमुख मुद्राएं- डॉलर, यूरो, पाउंड अथवा येन- होती हैं।
 
क्यों होती है एलओयू या एलसी की जरूरत?
 
आयातक बाजार से डॉलर खरीदकर सीधे अपने क्लाइंट को भुगतान क्यों नहीं कर सकते? इसका कारण यह है कि तमाम विकासशील देशों में स्थानीय मुद्रा के पूर्ण परिवर्तन की मंजूरी नहीं है। ऐसे में आप स्थानीय बाजार से अपने मन माफिक डॉलर बाजार से खरीदकर ग्राहक के प्रति अपने भुगतान दायित्व का निर्वहन नहीं कर सकते। हमारे रुपये के लिए भी यही मामला है। यहां के नागरिक साल में एक निश्चित सीमा से अधिक नहीं भेज सकते हैं। फिलहाल यह सीमा 2,50,000 डॉलर प्रति व्यक्ति है, लेकिन कारोबार के लिहाज से यह काफी कम है।
 
इसी सीमा को आंशिक परिवर्तनीयता कहा जाता है। लोग अधिक से अधिक विदेशी मुद्रा देश में ला सकते हैं लेकिन आपको अधिकतर रकम यहीं रख सकते हैं। भारतीय रुपया भी आंशिक परिवर्तनीय है क्योंकि इसके नियामक नियामक को डर है कि यदि रुपये को दोतरफा आवाजाही के लिए बिल्कुल मुक्त किया गया तो स्थानीय बाजार और अर्थव्यवस्था में भारी उतार-चढ़ाव हो सकता है। ऐसे में डॉलर बनाम रुपये में उतार-चढ़ाव के समय कोई भी निवेशक मोटी कमाई कर सकता है जिससे विनिमय दर प्रभावित होगी। इन झटकों से निपटने की क्षमता के आधार पर ही किसी अर्थव्यवस्था की सेहत का आकलन किया जाता है। ऐसे में कारोबारियों के कामकाज को सुचारु रखने के लिए इन देशों के बैंकिंग नियामकों ने एलओसी/एलसी की मंजूरी दी है।
 
कैसे काम करता है एलओयू/एलसी?
 
इस मामले में आयात यानी नीरव मोदी पीएनबी के ब्रैडी हाउस शाखा पहुंचे और कहा कि हीरा खरीदने के लिए उन्हें अपने विदेशी क्लाइंट को 10 करोड़ डॉलर भुगतान करना जरूरी है। वह खुद ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि रुपया पूर्ण परिवर्तनीय नहीं है। यदि सबकुछ नियमों के मुताबिक होता तो पीएनबी के अधिकारी नीरव मोदी से पूछते कि वह दो में से किस विकल्प को चुनना चाहते हैं।
 
पहला, नीरव मोदी पीएनबी से रुपये में उधारी लेकर बैंक के जरिये उस ऋण को डॉलर में परिवर्तित कर पीएनबी की विदेशी शाखा के जरिये उस हीरा व्यापारी को डॉलर में भुगतान कर सकते थे। इसके लिए विनिमय दर एवं अन्य करों का भुगतान करना जरूरी है। बैंक उनसे एक घोषणा पत्र एवं ब्याज दर के साथ एक ऋण अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाने के बाद अपनी विदेशी शाखा के जरिये उस हीरा व्यापारी को डॉलर में भुगतान कर देता। दूसरा, पीएनबी एक गारंटी लिख सकता है जो एक साल तक के लिए वैध हो। उसे पीएनबी की किसी भी विदेशी शाखा में जमा कराया जा सकता है। सुविधा के लिए पीएनबी खुद अपनी स्थानीय शाखा से उनके लिए यह काम कर सकता है और स्विफ्ट फाइनैंशियल मैसेजिंग सिस्टम के जरिये अन्य शाखा को निर्देश दे सकता है। अन्य शाखा तत्काल पीएनबी के विदेशी खाते में 10 लाख डॉलर का भुगतान कर देगी। इस विदेशी खाते को नोस्ट्रो खाता कहा जाता है। 
 
कहां हुआ घोटाला?
 
घोटाला यह है कि नीरव मोदी ने एलओयू के तहत रकम जुटाने के लिए आवश्यक जमानत राशि का भुगतान नहीं किया। सीबीआई में पीएनबी के एफआईआर रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले यह रकम 280 करोड़ रुपये थी। बाद में पता चला कि नीरव मोदी ने 2011 के बाद से ही पर्याप्त जमानत राशि का भुगतान नहीं किया है जो अब करीब 114 अरब रुपये है। बैंक के डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टïी ने जब बैंक की स्विफ्ट सिस्टम की जांच की तो पता चला कि उसे कोर बैंकिंग सिस्टम से एकीकृत नहीं किया गया था।
 
क्या पहली बार हुआ है ऐसा घोटाला?
 
नहीं! भारतीय बैंकिंग जगत के अधिकतर घोटाले का तार एलसी के इस्तेमाल से जुड़े हैं। लगता है कि पीएनबी इन घोटालेबाजों का पसंदीदा बैंक रहा है। 1990 में पीएनबी की लंदन शाखा में एक बड़ा एलसी घोटाला सामने आया था लेकिन देश की प्रतिष्ठïा और जमाकर्ताओं की सुरक्षा के लिए उन शाखाओं का विलय भारतीय स्टेट बैंक में कर दिया गया। उस समय बैंक के चेयरमैन को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी। हाल में जूम डेवलपर्स (35 अरब रुपये), विनसम डायमंड्ïस (70 अरब रुपये) और अब नीरव मोदी जैसे सभी मामलों में एलसी के जरिये घोटाला किया गया। इन सभी मामलों के केंद्र में पीएनबी रहा है।
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