सरकारी बैंकों के निजीकरण का विरोध क्यों कर रही माकपा

अर्चिस मोहन | नई दिल्ली Feb 23, 2018 10:13 PM IST

मुख्य विपक्षी दल कह रही हैं कि वे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के निजीकरण की दिशा में उठाए गए किसी भी कदम का विरोध करेंगी। इस मामले को 5 मार्च से दोबारा शुरू होने जा रहे बजट सत्र में उठाने की तैयारी कर ली गई है।   जुलाई 1969 में इंदिरा गांधी सरकार ने 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। 1980 में अन्य 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। 1969 के सरकार के निर्णय में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी और पीएसबी के निजीकरण के किसी भी पहल का लगातार विरोध करती आ रही है। 
 
भाकपा नेता डी राजा कहते हैं, 'आजादी के समय सभी बैंक निजी क्षेत्र में थे। चूंकि भारत ने नियोजित विकास को अपनाया था, इसलिए दीर्घावधि परियोजनाओं के लिए धन की जरूरत थी लेकिन निजी बैंक ऋण नहीं देते थे।' वर्ष 1951 में केंद्र सरकार ने ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति बनाई थी। समिति ने पाया कि ग्रामीण क्षेत्रों को बैंक ऋण की भारी जरूरत है।  1955 में इम्पीरियल बैंक को भारतीय स्टेट बैंक में तब्दील कर दिया गया। राजा बताते हैं कि इसे ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाएं खोलने की जिम्मेदारी दी गई थी लेकिन बहुत कम शाखाएं ही खोली गईं। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतें, कृषि क्षेत्र को और अधिक ऋण, रोजगार पैदा करने के लिए लघु उद्योगों के लिए ऋण जैसी जरूरतें पूरी नहीं हो पाई। 
 
1967 में कई राज्यों में हुए विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा। राजा कहते हैं कि तब कांग्रेस को महसूस हुआ कि उसे गरीबों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए गरीबों के हित में नीतियां बनाने की दरकार है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और धन के गुप्त ठिकानों के उन्मूलन का प्रस्ताव रखा, जिसका भाकपा ने समर्थन किया था। मोरारजी देसाई ने सरकार के इस कदम का विरोध किया था।   नतीजतन कांग्रेस का विभाजन हो गया लेकिन इंदिरा गांधी संसद में भाकपा के समर्थन से बैंक राष्ट्रीयकरण के मुद्ïदे पर आगे बढ़ीं। 1975 में ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की शुरुआत हुई। 
 
भाकपा नेता कहते हैं, 'आज दो तिहाई बैंकिंग व्यवस्था सार्वजनिक क्षेत्र में है। बैंक शाखाएं 8,000 से बढ़कर 85,000 हो चुकी हैं। जमा 110 लाख करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। ऋण वर्ष 1969 के 3,500 करोड़ रुपये से बढ़कर आज 75 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।'  वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग की सरकार बैंकों के निजीकरण के उद्ïदेश्य से संसद में एक विधेयक लेकर आई थी। इस विधेयक का भाकपा सहित अन्य दलों ने भारी विरोध किया और विधेयक से सरकार को हाथ खींचना पड़ा।  
 
राजा बताते हैं, आज गैर-निष्पादित आस्तियां (एनपीए) या फंसा हुआ कर्ज बड़ा मामला है और यह 9.50 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। एक ओर उन्हें छोड़ दिया जाता है या उस राशि को बट्ïटे खाते में डाल दिया जाता है तो दूसरी ओर गरीब लेनदारों को परेशान किया जाता है। लोगों को यह जानने का हक है कि बैंकों में क्या हो रहा है।   भाकपा नेता कहते हैं, पंजाब नैशनल बैंक धोखाधड़ी का मामला निस्संदेह शर्मनाक और खौफनाक है, लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है। इस प्रकार की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। हर्षद मेहता, केतन पारेख और विजय माल्या ऐसे बड़े नाम हैं जिन्होंने बैंकों के साथ धोखाधड़ी की है। 
 
राजा कहते हैं, 'आगामी सरकारों ने इससे कोई सबक नहीं लिया, उसी का नतीजा है कि बैंक के साथ फिर से एक बड़ी धोखाधड़ी सामने आई है। केंद्र सरकार यह भी दिखाना चाहती है कि यह सब किया धरा निचले स्तर के अधिकारियों का है। जबकि यह मुमकिन नहीं है। वहां ऑडिट की व्यवस्था है। सच्चाई छिपी नहीं रहेगी। सीबीआई जांच चल रही है और हमने संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच कराने की मांग की है।' वह कहते हैं, विभिन्न सरकारों ने धोखाधड़ी रोकने के लिए समय-समय पर बैंकिंग व्यवस्था में अधिक प्रौद्योगिकी लाने का निर्णय लिया जिसके लिए यूनियनें राजी हो गईं, लेकिन बैंकों के साथ धोखाधड़ी अभी भी जारी है। वह कहते हैं कि आभूषण कारोबारी नीरव मोदी जैसे लोग राजनीतिक दलों के साथ सांठगांठ की वजह से प्रभावशाली हो जाते हैं। वह कहते हैं कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कीजिए, लेकिन इतने भर से काम नहीं चलेगा। इस मामले में एक विस्तृत तहकीकात की जरूरत है। 
 
भाकपा नेता को यह बात अजीब और दिलचस्प लग रही है कि एसोसिएटेड चैंबर ऑफ कॉमर्स ने पीएनबी धोखाधड़ी मामले को लेकर बैंकों के निजीकरण की मांग की है, लेकिन उसने सुविधाजनक तरीके भारत में निजी बैंकों के पिछले कामों को भुला दिया।   राजा द्वारा जुटाए गए आंकड़ों की मानें तो 1969 से अबतक 36 निजी बैंकों को उनके कुप्रबंधन के लिए जनहित में प्रतिबंधित किया गया और अंतत: सभी बंद हो गए।  वह बताते हैं, 1948 से 1968 के बीच 20 वर्षों में 736 निजी बैंक या तो विफल हो गए या उनका विलय कर दिया गया, या उन्हें कार्य करने से रोक दिया गया या फिर उन्होंने अपनी देनदारियों और परिसंपत्ति को स्थानांतरित कर दिया। 
 
राजा पूछते हैं कि अगर निजी बैंक वास्तव में सक्षम हैं, तो ये बैंक क्यों बंद हुए या फिर दूसरे बैंकों के साथ इनका विलय क्यों हुआ? इनमें से ज्यादातर बैंकों का विलय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ किया गया था। मैं एसोचैम के लालच को समझता हूं, लेकिन वे इसका दावा नहीं कर सकते कि निजी बैंक ज्यादा सक्षम हैं।  बैंकों में खतरनाक तरीके से बढ़ रहे फंसे हुए कर्ज के मसले पर वह पूछते हैं कि कौन मुजरिम हैं और कौन डिफॉल्टर? क्या वे सभी निजी कंपनियां, उद्योगपति और कॉरपोरेट घराने नहीं हैं? 
 
वह कहते हैं कि कुल 253,000 करोड़ रुपये के एनपीए के 12 मामलों को दिवालिया एवं ऋणशोधन कार्रवाई के लिए नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास भेजा गया है। क्या ये सभी शीर्ष निजी कॉरपोरेट लेनदार नहीं हैं? वे अपने ऋण का भुगतान क्यों नहीं करते हैं? क्या यही उनकी क्षमता है? क्या बैंकों का निजीकरण कर उसे इन लोगों के हाथों में सौंप देना चाहिए?      राजा कहते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा दिए गए ऋण का बड़ा हिस्सा निजी कॉरपोरेट घरानों को दिया गया है। मैं पूछता हूं कि अगर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सक्षम नहीं है तो ये ऋण निजी बैंकों से न लेकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से क्यों लिए गए। हां, उन अधिकारियों पर कार्रवाई करने की जरूरत है जिन्होंने नीरव मोदी को फायदा पहुंचाने के लिए मनमाने तरीके से काम किया। लेकिन यह सच नहीं है कि नीरव मोदी द्वारा संचालित एक निजी कॉरपोरेट ने उन्हें प्रलोभन देकर झांसे में ले लिया।  
 
राजा कहते हैं कि एसोचैम और अन्य उद्योग चैंबरों को निजी क्षेत्र के कॉरपोरेट डिफॉल्टरों को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिए गए ऋण को चुकता करने के लिए कहना चाहिए और पीएनबी के साथ धोखाधड़ी करने के लिए नीरव मोदी की निंदा करनी चाहिए।  राजा कहते हैं कि बैंकों के निजीकरण की कोई जरूरत नहीं है। हमारे बैंकों को और अधिक सुदृढ़ होना होगा।   
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