बैंकों की बॉन्ड वापसी से निवेशकों में खलबली

अरूप रॉय और नम्रता आचार्य | मुंबई/कोलकाता Mar 08, 2018 10:22 PM IST

इनका चलन समाप्त होने के आसार

बाजार में अब तक ऐसे करीब 761.14 अरब  रुपये के बॉन्ड किए गए हैं जारी
चार बैंकों ने समय से पहले 109 अरब रुपये के एटी-1 बॉन्ड लिए वापस
निवेशकों को अंदेशा, खत्म हो सकता है इस तरह के बॉन्ड का चलन

चार बैंकों द्वारा अपने एडिशनल टियर-1 बॉन्ड (एटी1) वापस लिए जाने से निवेशकों में खलबली है क्योंकि इससे इनका चलन समाप्त होने की पूरी संभावना है। ये बॉन्ड बेसल-3 नियमों के तहत अर्ध इक्विटी के तौर पर जारी किए गए थे। अब तक स्थानीय बाजारों में 761.14 अरब रुपये के इस तरह के बॉन्ड जारी किए गए हैं। इन्हें जारी करने वाले बैंकों में निजी और एक्जिम बैंक शामिल हैं। भारतीय स्टेट बैंक की दुबई शाखा ने एटी1 बॉन्डों के जरिये विदेशों में 30 करोड़ डॉलर जुटाए। लगभग हर बैंक ने ये बॉन्ड जारी किए हैं। रिजर्व बैंक की त्वरित उपचारात्मक योजना (पीसीए) में शामिल किए गए 11 बैंकों में से 9 बैंकों ने इन बॉन्डों के जरिये 202.9 अरब रुपये जुटाए हैं।

सरकार के दबाव के कारण बैंक ऑफ महाराष्ट्र, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, देना बैंक और आईडीबीआई बैंक ने बाजार से 109 अरब रुपये के एटी1 बॉन्ड वापस ले लिए हैं। देश में एटी1 बॉन्ड संकट करीब-करीब उसी तरह का है जैसे यूरोप को दो साल पहले झेलना पड़ा था। लेकिन किसी भी भारतीय बैंक ने भुगतान प्रतिबद्घताओं में चूक नहीं की है और न ही भुगतान को टाला है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक बॉन्ड वापस लेने से भविष्य में चूक की संभावना खत्म हो गई है। पीसीए में शामिल दूसरे बैंक भी इस तरह का कदम उठाने की तैयारी में हैं।

कोलकाता के यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के एक वरिष्ठï अधिकारी ने कहा, 'दो ही परिस्थितियों में बैंकों को एटी1 बॉन्ड वापस लेने की अनुमति है। इनमें एक कर है और दूसरा नियामकीय परिस्थितियां। हमारे मामले में सरकार ने कार्रवाई की है और पीसीए को नियामकीय परिस्थितियों के तौर पर देखा जा रहा है। इसलिए हमने एटी1 बॉन्ड वापस लेने का फैसला किया है।'

अधिकारी ने कहा कि इस मुद्दे पर बैंक ने स्पष्टीकरण मांगा है और जो जवाब मिलेगा उसके आधार पर रिकॉल का विकल्प इस्तेमाल किया जाएगा। एटी1 बॉन्ड की जगह बेहतर गुणवत्ता वाले बॉन्ड लाने का विकल्प है, लेकिन इस पर ब्याज कम हो सकता है। अधिकारी ने कहा, 'अगर एटी1 बॉन्ड की जगह अधिक गुणवत्ता वाला दूसरा बॉन्ड आता है तो हमें ब्याज के मद में अधिक रकम नहीं देनी होगी। हालांकि इसके लिए सरकार को समय पर पूंजी देनी होगी।'

ये बॉन्ड अधिक प्राप्तियां दे रहे थे और इलाहाबाद बैंक और ओवरसीज बैंक के मामले में तो यह 11.85 प्रतिशत तक  पहुंच गई थीं। चूंकि, सरकारी बैंकों ने इन बॉन्ड की पेशकश की थी, इसलिए एक तरह से इन्हें सरकारी गारंटी भी प्राप्त थी, जिसे देखते हुए निवेशकों ने इसे हाथों-हाथ ले लिया। दरअसल ऊंची प्राप्तियों की वजह यह थी कि बॉन्ड के साथ 'लॉस एब्जॉप्र्सशन क्लाउज' था। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर किसी बैंक को नुकसान हो रहा था तो वह ब्याज भुगतान टाल या रोक सकता था। बैंकों की हालत देखते हुए आरबीआई आगे आया और बैंकों को उनके जमा रकम से ब्याज देने का विकल्प दिया।

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