कनिष्क गोल्ड ने लगाई 824 करोड़ रुपये की चपत

गिरीश बाबू | चेन्नई Mar 21, 2018 10:08 PM IST

एसबीआई ने दर्ज कराया मामला
सीबीआई ने प्रवर्तकों के आवासों की ली तालाशी

आभूषण से जुड़ा बैंक धोखाधड़ी का एक और मामला सामने आया है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने चेन्नई की कंपनी कनिष्क गोल्ड पर 14 बैंकों के एक कंसोर्टियम को 824 करोड़ रुपये की चपत लगाने का आरोप लगाया है। एसबीआई ने सीबीआई से कंपनी, इसके प्रवर्तक भूपेश कुमार जैन, निदेशक नीता जैन, साझेदारों और ऑडिटरों के खिलाफ मामला दर्ज करने का अनुरोध किया है। कंपनी कांचीपुरम में क्रिज ब्रांड से सोने के आभूषण बनाती है। इस बीच, सीबीआई ने एफआईआर दर्र्ज कर कनिष्क गोल्ड के प्रर्वतकों के आवासों की तलाशी ली।

दिसंबर 2017 तक कंपनी पर एसबीआई का बकाया एनपीए 240 करोड़ रुपये, पंजाब नैशनल बैंक का 128 करोड़ रुपये, सिंडिकेट बैंक का 54.94 करोड़ रुपये, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का 53.68 करोड़ रुपये, आईडीबीआई बैंक का 49.13 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ इंडिया का 46.2 करोड़ रुपये था। 1 जनवरी, 2018 तक ब्याज सहित बैंकों का कुल नुकसान 824 करोड़ रुपये पहुंच चुका था।

बैंकों के पास अपने नुकसान की भरपाई के लिए जमानत के तौर पर केवल 158 करोड़ रुपये की संपत्ति थी। एसबीआई की अगुआई में 14 बैंकों के कंसोर्टियम ने कंपनी को सोने खरीदने के लिए कार्यशील पूंजी क्रेडिट सुविधा दी थी। एसबीआई ने जनवरी के दाखिल याचिका में कहा कि बैंकों की उधारी समय-समय पर बढ़ाई गई और कार्यशील पूंजी की सीमा में बढ़ोतरी मौजूदा संपत्तियों और बिक्री पर आधारित थी। 

2008-09 में कनिष्क की बिक्री 1.80 अरब रुपये थी जो 2015-16 में बढ़कर 17.80 अरब रुपये पहुंच गई। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने दिसंबर 2016 में कंपनी की रेटिंग अपग्रेड करके ए- की थी और फिर 11 अप्रैल, 2017 को इसे बरकरार रखा। कंपनी ने मार्च 2017 में 8 बैंकों को ब्याज भुगतान करने में देरी की और अप्रैल 2017 में किसी भी बैंक को ब्याज का भुगतान नहीं किया। बैंकों ने अप्रैल, 2017 में स्टॉक ऑडिट शुरू किया। जैन ने एक पत्र जारी कर 2009 से रिकॉर्ड को लेकर झूठ बोलने की बात स्वीकार की।

मई 2017 में एक संयुक्त अवलोकन में पाया गया कि कंपनी की फैक्ट्री में कोई कामकाज नहीं हो रहा था और वहां कोई माल नहीं था। साथ ही कंपनी के शोरूम भी बंद पड़े थे। एसबीआई ने आरोप लगाया कि फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि कंपनी ने गलत रिकॉर्ड रखने, फंड को अन्यत्र भेजने और स्टॉक निपटाने की बात सामने आई थी। इन अनियमितताओं के बावजूद कंपनी के ऑडिटर ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में सबकुछ सामान्य बताया था।

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