बैंकिंग क्षेत्र को पुख्ता करने का यह सही समय

अभिजित लेले और विशाल छाबड़‍िया |  Apr 04, 2018 10:42 PM IST

बीएस बातचीत

भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार का मानना है कि हाल में बैंकिंग क्षेत्र से नकारात्मक खबरें आने के बाद एक बैंकर के तौर पर यह काफी चुनौतीपूर्ण समय है। हालांकि वित्त वर्ष 2019 में संभावनाएं बेहतर रहने की उम्मीद है। अभिजित लेले और विशाल छाबड़‍िया ने उनसे की बातचीत :

पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में हुए फर्जीवाड़े से बैंकरों और उनके काम-काज पर कोई असर पड़ा है?
 
अगर कोई बड़ी घटना होती है तो उसका असर भी उतना ही जबरदस्त होता है। परिस्थितियां जो भी सामने आएंगी, हमें उनका सामना करना होगा। अगर आप वाकई सभी चीजें दुरुस्त करना चाहते हैं तो इससे बेहतर और कोई समय नहीं हो सकता है, क्योंकि अब सभी एकजुट और एकमत हैं। पहले जोखिम प्रबंधन एवं अनुपालन को लेकर गंभीर नहीं रहने वाले कर्मचारियों की स्थिति एक साल पहले के मुकाबले बिल्कुल भिन्न है। इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा समय बैंकरों के लिए प्रतिकूल चल रहा है, लेकिन चुनौतियों से तो निपटना ही पड़ेगा। 
 
पांच सहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक के विलय के बाद वित्त वर्ष 2018 में एसबीआई ने पहली बार एक समेकित इकाई के तौर पर काम किया। विभिन्न चुनौतियों और लाभों के बारे में आप क्या कहेंगे?
 
विलय प्रक्रिया काफी सहज रही और मानव संसाधन, ग्राहकों के खाते और सूचना-प्रौद्योगिकी प्रणाली के एकीकरण में कोई परेशानी नहीं हुई। चिंता की कोई बात सामने नहीं है। हालांकि एसबीआई और सहायक बैंकों में संचालन मानकों में भिन्नता की वजह से सहज होने में थोड़ा समय लगेगा। पिछले कुछ महीनों के दौरान सभी चीजें एसबीआई के काम-काज के अनुरूप व्यवस्थित की गईं। विलय के बाद बहीखाते पर पडऩे वाला असर जून 2017 तिमाही में दिखा। कर्मचारियों और शाखाओं के एकीकरण में कोई क्कित नहीं आई।
 
विलय का परिसंपत्ति गुणवत्ता पर कितना असर हुआ? 
 
हमें पता था कि विलय का बहीखाते पर असर होगा। वैसे मोटे तौर पर 2017-18 और इससे पिछले वित्त वर्ष में एसबीआई की परिसंपत्ति गुणवत्ता दुरुस्त हो गई थी। इस तरह, 1 अप्रैल 2018 से हम दुरुस्त बहीखाते के साथ शुरुआत कर रहे हैं।  
 
फंसी संपत्तियों और इसके परिणामस्वरूप प्रावधान किए जाने के बीच एनसीएलटी के तहत दिवालिया हो चुकी कंपनियों, खासकर 12 इकाइयों, की समाधान योजना पर आपकी क्या राय है? 
 
हमें इस महीने समाधान योजना आने की उम्मीद है। जहां तक प्रावधानों की बात है तो इस बारे में तटस्थ रहा जा सकता है, या फिर कुछ मिलने की उम्मीद की जा सकती है। हम एस्सार स्टील के लिए बोलियां आने का इंतजार कर रहे हैं। एक बार यह स्पष्टï होने पर एक सही अनुमान लगाया जा सकेगा, क्योंकि बाकी मामलों में बोलियां आ गई हैं और हमें अपनी स्थिति का अंदाजा हो गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो एस्सार मामला खासा महत्त्वपूर्ण है और जो रकम आएगी वह जून, 2018 तिमाही में परिलिक्षित होगी। अगले कुछ दिनों में भूषण स्टील सहित कई महत्त्वपूर्ण निर्णय आएंगे।
 
इस्पात क्षेत्र की अच्छी संभावनाओं के कारण इस्पात परिसंपत्तियों के लिए खासी बोलियां आई हैं। क्या ईपीसी खंड के साथ भी ऐसा ही होगा?
ईपीसी क्षेत्र में स्थिति ठीक नहीं है। इस क्षेत्र से जुड़े मामलों के हल होने की राह में कई दिक्कतें हैं। अधूरी परियोजनाओं, सभी पक्षों से किए जा रहे दावों के कारण मामला पेचीदा हो गया है। इस्पात क्षेत्र में संयंत्र, मशीनें और अन्य परिसंपत्तियां हैं, इसलिए अधिक से अधिक वसूली संभव है, लेकिन ईपीसी क्षेत्र में यह प्रतिशत काफी कम रहेगा। 
आरबीआई ने बॉन्ड कारोबार में हुए नुकसान पर दिशानिर्देश में बदलाव होने से मार्च तिमाही में क्या असर होगा? बॉन्ड नीलामी में शामिल होने की पहल करेंगे?
 
मार्च, 2018 के लिए जितना प्रावधान करने की पहले योजना थी, उनमें से अब अगली तीन तिमाहियों मेंं हमें केवल एक चौथाई हिस्से का प्रावधान करना होगा। हमें अगले वित्त वर्ष का भी ख्याल रखना है। एबसीआई की बॉन्ड बाजार में खासी मौजूदगी है, इसलिए हम इससे दूर नहीं रह सकते। हम केवल नुकसान कम करने के लिए अवधि कम कर रहे हैं। 
 
वर्ष 2017-18 में ऋण वृद्धि का प्रदर्शन कैसा रहा है और वर्ष 2018-19 के लिए आपका क्या आकलन है?
 
मार्च का महीना अच्छा रहा है। खुदरा क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर है पर बड़ी कंपनियों के पोर्टफोलियो में उतार-चढ़ाव दिख रहा है। हमने ऋण प्रक्रिया में सुधार किया है और वित्त वर्ष 2019 में विलय का असर नहीं होगा। वर्ष 2018-19 पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले बेहतर दिखता है जो बेहद चुनौतीपूर्ण साल है। लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्र में मंजूरी और वितरण के स्तर पर वृद्धि दिखनी शुरू हुई है। वित्त वर्ष 2018 में कुल ऋण वृद्धि महज 6 फीसदी थी और हम यह उम्मीद करते हैं कि वित्त वर्ष 2019 में दो अंक (10 फीसदी) का सुधार दिखेगा। ऋण-जमा अनुपात में भी सुधार होगा। हमारा लक्ष्य इसे 66-67 फीसदी के स्तर से 71-72 फीसदी तक पहुंचाना है। इसके प्रबंधन के दो तरीके हैं या तो हम ऋण के स्तर को बढ़ाएं या फिर जमाओं की रफ्तार में कटौती करें। इस वक्त हमारे पास परियोजनाओं के लिए ऋण देने के अच्छे मौके मौजूद हैं, मसलन राजस्थान रिफाइनरी, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (एनटीपीसी, इंडियन ऑयल और कोल इंडिया) द्वारा तीन उर्वरक संयंत्र लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा अक्षय ऊर्जा और सड़कों के क्षेत्र में भी ऋण देने की गुंजाइश है।
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