'ग्राहकों को दरों में कटौती का लाभ देने की राह में एनपीए बाधक'

अद्वैत राव पलेपू | मुंबई Apr 05, 2018 10:59 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2018-19 के लिए अपनी पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में कहा है कि गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) में तेजी की वजह से देश के बैंकिंग तंत्र को आसान मौद्रिक नीति का लाभ अपने ग्राहकों को देने में कामयाबी नहीं मिल पा रही है। बढ़ते एनपीए की समस्या से देश की बैंकिंग व्यवस्था प्रभावित हुई है, क्योंकि बैंकों को सस्ती फंडिंग की प्रणाली के लाभ के बावजूद ऋणों पर ऊंची दरें वसूलने को मजबूर होना पड़ रहा है। 

मौद्रिक नीति समीक्षा में उन प्रक्रियाओं का जिक्र किया गया है जिनकी वजह से परिसंपत्ति कीमतें और सामान्य आर्थिक हालात मौद्रिक नीति से संबंधित निर्णयों से प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि केंद्रीय बैंक रीपो दर में 50 आधार अंक तक की कटौती करता है तो किस तरह से छोटे कर्जदार को दर कटौती का लाभ कब तक मिलेगा? और यदि ऐसा होता है तो 50 आधार अंक की दर कटौती से कर्जदार को कितना लाभ मिलेगा?

आरबीआई के शोधकर्ताओं द्वारा 72 बैंकों पर एक अध्ययन कराया गया। इन बैंकों में 26 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी), 19 निजी क्षेत्र के बैंक और 27 विदेशी बैंक शामिल हैं। यह अध्ययन 2010-11 की पहली तिमाही से 2017-18 की पहली तिमाही की अवधि के दौरान कराया गया। अध्ययन में पाया गया कि इन अवधियों (ऋण वृद्घि की पहली अवधि) के दौरान सकल एनपीए अनुपात में तब सकारात्मक बदलाव दिखा था जब यह निचले स्तर पर था, क्योंकि बैंक अतिरिक्त 'रिस्क प्रीमियम' वसूलने में सक्षम थे जिससे क्रेडिट रिस्क (सकल एनपीए) की भरपाई की जा सकी। हालांकि जब सकल एनपीए अनुपात (दूसरी अवधि) बढ़ा तो मौद्रिक नीति का नकारात्मक प्रभाव पड़ा, क्योंकि बैंक बढ़ते एनपीए का पूरा बोझ नए ग्राहकों (कर्ज लेने वालों) पर डालने में सफल नहीं हो सके। 

केंद्रीय बैंक के शोधकर्ताओं ने शुद्घ ब्याज मार्जिन (एनआईएम) पर ध्यान दिया, जो ब्याज आय और ब्याज खर्च के बीच अंतर है। अध्ययन में पाया गया कि यदि मौद्रिक नीति में नरमी (दर कटौती) बरती जाती है तो बैंक अपनी फंडिंग लागत में कमी के हिसाब से अपनी उधारी दरों को कम नहीं करेंगे। 

अध्ययन में कहा गया कि अधिक एनपीए का मतलब है कि बैंकों को अपने लक्षित लाभ को बरकरार रखने के प्रयास में अधिक एनआईएम वसूलने की जरूरत होगी। जब परिसंपत्ति गुणवत्ता में कमी आती है तो बैंक ऊंचे उधारी जोखिम शुल्क पर जोर देते हैं जिससे नीतिगत दर कटौती का लाभ वाणिज्यिक बैंकों की उधारी दरों के जरिये मुहैया कराने की राह में बाधा आती है। 
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