मोदी के फैसलों से हिला बैंकिंग क्षेत्र

अनूप रॉय |  May 29, 2018 11:32 AM IST

सरकार ने अगस्त, 2015 में सरकारी बैंकों में सुधार के लिए सात सूत्री योजना 'इंद्रधनुष' की घोषणा की थी। इसे करीब तीन साल हो गए, लेकिन अभी योजना के ज्यादातर बिंदुओं पर काम ही शुरू नहीं हो पाया है। हालांकि बैंकों की बैंलेंस शीट को साफ-सुथरा बनाने की भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की पहल को मदद देने में सरकार ने राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूर दिखाई है। यह उद्देश्य हासिल करने के लिए ऋण शोधन एवं दिवालिया संहिता के रूप में कुछ बड़े सुधार शुरू किए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह देखना होगा कि क्या इससे भारतीय बैंकिंग क्षेत्र को स्वस्थ बनने में मदद मिलती है या ऐसा घाव मिलता है, जो कई वर्षों तक सालता रहेगा।  

ऐसा लगता है कि बैंक अधिकारी सरकार से इसलिए खुश हैं क्योंकि वह बैंकों के परिचालन मामलों में हस्तक्षेप न करने के अपने वादे पर अडिग रही है। लेकिन वे मोदी राज में अपने ऊपर निगरानी बढऩे को लेकर भी चिंतित हैं। बैंक अधिकारियों का कहना है कि हाल में बैंक अधिकारियों की गिरफ्तारियों और उन पर मुकदमों ने  साफ तौर पर उनका आत्मविश्वास हिला दिया है। वहीं फंसे कर्जों (एनपीए) को लेकर आरबीआई के सख्त नियमों से बैंकों को मोटी छूट देकर अपने फंसे कर्ज बेचने को मजबूर होना पड़ सकता है। अगर कुछ समय दिया जाता तो इनमें से कुछ कर्जों को वसूला जा सकता था। हालांकि सरकार ने यह वादा जरूर किया है कि वह बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डालेगी ताकि वे अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा बना सकें।

भारतीय स्टेट बैंक ने 1 अप्रैल, 2017 को अपने सहायक बैंकों का खुद में विलय किया था, जिससे वह विश्व के शीर्ष 50 बैंकों में शामिल हो गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बैंकों को निजीकरण के लिए प्रोत्साहित कर बड़े सुधारों का संकेत दिया है। इसकी शुरुआत आईडीबीआई बैंक से की गई है। हालांकि इस साल जनवरी में जाने-माने सराफ नीरव मोदी के पंजाब नैशनल बैंक में 130 अरब रुपये का घोटाला कर देने से पूरा बैंकिंग तंत्र हिल गया। उसके बाद सरकार ने बैंक अधिकारियों पर निगरानी बढ़ा दी। अगले आम चुनाव भी नजदीक हैं, इसलिए बैंक अधिकारियों को मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा है। 

यह कहना गलत नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी ने विभिन्न समाजिक प्रयोगों के लिए बैंकों पर दांव लगाया है। मोदी ने प्रत्येक परिवार का खाता खोलने से लेकर, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, विवादास्पद नोटबंदी के जरिये कालेधन को साफ करने के प्रयासों समेत अपने सामाजिक और आर्थिक एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए बैंक अधिकारियों की मदद ली है। बैंक अधिकारियों ने भी उन्हें निराश नहीं किया, लेकिन पिछले कुछ समय से इस मधुरता में कड़वाहट आ गई है।

सरकार ने सत्ता में आते ही बैंक अधिकारियों से बड़े वादे किए थे। बैंकिंग सुधारों पर गठित पीजे नायक समिति की रिपोर्ट को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए सरकार ने चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के पद अलग-अलग कर दिए। सरकार ने दो बाहरी लोगों को बैंक ऑफ बड़ौदा और केनरा बैंक का प्रमुख बनाया। ये बैंक देश के सबसे बड़े बैंकों में शामिल हैं। अगला कदम इंद्रधनुष को घोषणा करना था।

इस योजना को अक्षरों के हिसाब से क्रमबद्ध किया गया है, जिसमें नियुक्तियां, बैंक बोर्ड ब्यूरो, पूंजीकरण, सरकारी बैंकों को दबाव मुक्त बनाना, सशक्तीकरण, जवाबदेही का ढांचा, प्रशासनिक सुधार शामिल हैं। बैंक अधिकारियों को कहा गया था कि सरकार बैंकों के मामलों में दखल नहीं देगी और प्रधानमंत्री ने उनको भरोसा दिलाया कि उन्हें उनके कार्यालय से कोई कॉल नहीं आएगी। बैंक अधिकारियों का कहना है कि मोदी अपने वादे पर खरे उतरे हैं। इसके बावजूद बैंकिंग क्षेत्र काफी कुछ कर सकता था। 

एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने कहा, 'इस सरकार से बहुत सी उम्मीदें जगी थीं, लेकिन वे असल में पूरी नहीं हुईं।' उदाहरण के लिए सशक्तीकरण और स्वामित्व तटस्थता का भी वादा किया गया था, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मानव संसाधन नीतियां अब भी एकसमान हैं। इसमें अच्छा प्रदर्शन करने वाले बैंक अधिकारियों के लिए कोई विशेष सम्मान या पुरस्कार का प्रावधान नहीं है। न ही इसमें रिटेंशन नीतियों, मनमाने स्थानांतरण और जानबूझकर परेशान करने से संबंधित कोई नियम नहीं हैं।

बैंकिंग क्षेत्र के एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि योजना तैयार है, लेकिन इसे लागू करने में अड़चन हैं। उन्होंने कहा, 'हमें कार्ययोजना दिखाने के बजाय वह योजना बताएं, जो आप अभी लागू करने जा रहे हैं।' बैंक अधिकारियों का कहना है कि दिवालिया संहिता खराब आस्तियों के समाधान का अच्छा विचार है, लेकिन राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) नया और अनुभवहीन है। लेकिन फिर भी इस संस्थान में बड़ी तादाद में मामले आ रहे हैं। इससे कई ऐसी पेचीदा स्थितियां पैदा हो रही हैं, जिनका कानून में जिक्र नहीं है। एनसीएलटी के न्यायाधीश ऋणग्रस्त संपत्तियों को लेकर तेजी से फैसले सुना रहे हैं, लेकिन इन मामलों पर और ज्यादा बहस होनी चाहिए।

बहुमत और संभवतया बड़े सुधारों की राजनीतिक इच्छाशक्ति होने के बावजूद सरकार खुद को स्वामित्व से दूर नहीं कर पाई। आरबीआई गवर्नर ने शुरुआत में यह सुधार से जल्द करने और केंद्रीय बैंक को सरकारी बैंकों के बोर्डों पर प्रभावी नियंत्रण की शक्ति देने का आग्रह किया था। इस समय आरबीआई नियामक होने के बावजूद बैंकों के बोर्ड को हटा नहीं सकता।  वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में फंसे कर्ज बढ़कर आसमान में पहुंच गए हैं। वर्ष 2014 की जून तिमाही में सूचीबद्ध बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) 2.43 लाख करोड़ रुपये थे। 
यह आंकड़ा 2017 की दिसंबर तिमाही के अंत में बढ़कर 8.82 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जिसमें एक बड़ा हिस्सा सरकारी बैंकों का था। सरकारी बैंकों का कुल एनपीए में हिस्सा जून, 2014 में 2.19 लाख करोड़ रुपये था, जो दिसंबर, 2017 के अंत तक बढ़कर 7.83 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। चिंताजनक बात यह है कि इस दौरान बैंकों का लाभ घटा है। 

पूरे बैंकिंग क्षेत्र का शुद्ध घाटा दिसंबर, 2017 तिमाही में 72.55 अरब रुपये रहा। जिस समय मोदी ने पदभार संभाला था, उस तिमाही में इस बैंकिंग क्षेत्र को 201.74 अरब रुपये का लाभ हुआ था। इसमें भी सरकारी बैंक 180.25 अरब रुपये के संयुक्त घाटे के लिए जिम्मेदार रहे। मोदी के सत्ता संभालने के समय उन्हें 115.70 अरब रुपये का लाभ हुआ था।

सरकारी बैंकों का बाजार पूंजीकरण 10 मई, 2018 को घटकर 4.47 लाख करोड़ रुपये पर आ गया, जो 26 मई, 2014 को 7.26 लाख करोड़ रुपये था। इसके विपरीत 2014 से अब तक निजी बैंकों का बाजार पूंजीकरण दोगुना यानी 6.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 13.4 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। 

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