शहरी सहकारी बैंकों को लघु वित्तीय बैंक की इजाजत

निकहत हेटावकर | मुंबई Jun 06, 2018 09:50 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक ने कई राज्यों में परिचालन करने वाले बड़े शहरी सहकारी बैंकों को लघु वित्तीय बैंक में तब्दील होने की अनुमति दे दी है, जो स्वैच्छिक होगा लेकिन इन्हें कुछ निश्चित मानक पूरे करने होंगे।  शहरी सहकारी बैंकों पर तत्कालीन डिप्टी गवर्नर आर गांधी की अध्यक्षता वाली समिति ने इस तरह की सिफारिश अगस्त 2015 में की थी। इनकी सिफारिशों को स्वीकार करते हुए शहरी सहकारी बैंकों को स्वैच्छिक तौर पर लघु वित्तीय बैंक में तब्दील होने की अनुमति दी गई है, लेकिन इसे कुछ निश्चित मानक पूरे करने होंगे। आरबीआई ने यह जानकारी दी।
 
आरबीआई के डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन ने आज मौद्रिक नीति की घोषणा के लिए आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा, कुछ हलकों से मांग उठी थी कि हमें शहरी सहकारी बैंकों को जॉइंट स्टॉक कंपनी बनने की इजाजत निश्चित तौर पर देनी चाहिए। चूंकि छोटे वित्तीय बैंकों के ऊपर भी उनके फंडामेंटल कारोबारी मॉडल के हिस्से के तौर पर वित्तीय समावेशन की जिम्मेदारी है, ऐसे में शहरी सहकारी बैंकों को लघु  वित्तीय बैंक में तब्दील होने की खातिर हम विस्तृत योजना सामने रखेंगे। छोटे वित्तीय बैंकों को अपनी समायोजित शुद्ध बैंक उधारी का 75 फीसदी प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज देना होता है।
 
आर गांधी की रिपोर्ट में कहा गया है, शहरी सरकारी बैंकों की स्थापना लघु बैंक के तौर पर की गई थी, जो निचले व मध्य वर्ग के लोगों को बैंकिंग सेवाओं की पेशकश करे। ऐसे में कम से कम बड़े शहरी सहकारी बैंकों को यूनिवर्सल वाणिज्यिक बैंकों में तब्दील होने के लिए जरूरी खाका बनाना होगा क्योंकि देश में वित्तीय क्षेत्र में बदलाव हो रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़े शहरी सहकारी बैंकों की महत्वाकांक्षा पर भी नियंत्रण रखा जाना चाहिए। अन्य महत्वपूर्ण चीजें, जिस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है - हितों का टकराव, सहकारिता में कमी, नियामकीय आर्बिट्रेज, पूंजी जुटाने की सीमा, आरबीआई के पास सीमित शक्ति, शहरी सहकारी बैंकों का पूंजीगत ढांचा और बढ़त के मौके, जो ऐसी तब्दीली के बाद सामने आएंगे।
 
सहकारी बैंक दोहरे नियंत्रण की व्यवस्था में काम करते हैं - आरबीआई और राज्य सरकार, दोनों की निगरानी होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सहकारी बैंकों के विनियमन पर आरबीआई के पास शक्ति का अभाव है और वाणिज्यिक बैंकों के हिसाब से आरबीआई इसकी निगरानी नहीं कर पाता है। ये चीजें शहरी सहकारी बैंकों के वाणिज्यिकरण में बाधा है।
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