सहकारी बैंकों को नहीं भायी योजना

नम्रता आचार्य और अभिजीत लेले | कोलकाता/मुंबई Jun 07, 2018 09:55 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) को लघु वित्त बैंकों (एसएफबी) में तब्दील होने की अनुमति दे दी है, पर इस योजना पर मुश्किल से ही कोई अमल करता दिख रहा है क्योंकि इस कदम को सहकारी क्षेत्र को अस्थिर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। यूसीबी सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में बेहद मजबूत क्षेत्र हैं, क्योंकि उनके समकक्ष त्रि-स्तरीय ग्रामीण सहकारी क्षेत्र को ज्यादा एनपीए और नुकसान से जूझना पड़ रहा है।  नैशनल फेडरेशन ऑफ अर्बन को-ऑपेरिटव बैंक्स ऐंड क्रेडिट सोसाइटीज (एनएएफसीयूबी) के मुख्य कार्याधिकारी सुभाष गुप्ता ने कहा, 'यूसीबी को बैंकों में तब्दील किए जाने से सहकारी ढांचा कमजोर होगा और इसलिए हम एसएफबी में तब्दील होने के पक्ष में नहीं हैं।'

 
संपूर्ण बैंक में तब्दील किए जाने की संभावना वाले कुछ बड़े यूसीबी में सारस्वत को-ऑपरेटिव बैंक, कोसमोस को-ऑपरेटिव बैंक और शेमराव विठल को-ऑपरेटिव बैंक मुख्य रूप से शामिल हैं।  पिछले वित्त वर्ष में सारस्वत को-ऑपरेटिव बैंक का कुल व्यवसाय 585 अरब रुपये और शुद्घ लाभ लगभग 2.41 अरब रुपये का रहा। कोसमोस को-ऑपरेटिव बैंक का कुल व्यवसाय वित्त वर्ष 2016 के अंत में 263.69 अरब रुपये और शुद्घ लाभ लगभग 46 करोड़ रुपये था। यह कुछ सबसे बड़े एसएफबी के लिए तुलना योग्य है।
 
सबसे बड़े शहरी सहकारी बैंक सारस्वत बैंक के चेयरमैन गौतम ठाकुर ने कहा, 'कॉपरेटिव मॉडल हमारे लिए अच्छा काम कर रहा है, चाहे यह व्यावसायिक वृद्घि हो या बढ़ती पूंजी। यह सबसे बड़ा यूसीबी है और दीर्घावधि जमाओं के जरिये 3 अरब रुपये की पूंजी जुटा रहा है।' मार्च 2017 के अंत में 1,562 यूसीबी और 94,384 ग्रामीण सहकारी बैंक थे जिनमें शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म को-ऑपरेटिव्स भी शामिल हैं। यूसीबी की कुल जमाएं 31 मार्च 2017 के अंत में 4,435 अरब रुपये पर थीं जबकि अग्रिम 2,612 अरब रुपये पर थीं। 2016-17 के अंत में, यूसीबी का सकल एनपीए लगभग 7.1 प्रतिशत था जबकि शुद्घ एनपीए लगभग 2.7 फीसदी पर, जो शिड्ïयूल्ड कमर्शियल बैंकों की तुलना में काफी कम है। 2016-17 में यूसीबी ने 39 अरब रुपये कर पश्चात शुद्घ लाभ दर्ज किया।
 
शुरू में आरबीआई ने यूसीबी के लिए एक उदार लाइसेंसिंग नीति अपनाई थी और उसके परिणामस्वरूप 1993-2004 की अवधि में यूसीबी की संख्या में तेजी से इजाफा दर्ज किया गया। इनकी लचर वित्तीय स्थिति की वजह से आरबीआई को 2005 में विजन डॉक्यूमेंट तैयार करने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिसके बाद विलय और बिक्री की वजह से यूसीबी की संख्या में कमी आई और यह आंकड़ा मार्च 2004 के 1926 से घटकर 2017 में 1526 यूसीबी रह गया। सर्वाधिक संख्या में विलय के संदर्भ में महाराष्ट्र आगे रहा, जिसके बाद गुजरात और आंध प्रदेश का स्थान रहा।
 
सहकारी ऋण संस्थाओं को दो श्रेणियों - शहरी और ग्रामीण- में विभाजित किया गया है। ग्रामीण श्रेणी को शॉर्ट (मध्यावधि के साथ) और लॉन्ग-टर्म क्रेडिट श्रेणियों में बांटा गया है। शॉर्ट-टर्म ग्रामीण ऋण के लिए त्रि-स्तरीय ढांचे - राज्य सहकारी बैकों, डीसीसीबी और पीएसी- पर अमल किया जाता है। वहीं लॉन्ग-टर्म क्रेडिट को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है- स्टेट को-ऑपरेटिव एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक्स और प्राइमरी को-ऑपरेटिव एग्रीकल्चर ऐंड रूरल डेवलपमेंट बैंक्स।  यदि सहकारी बैंकिंग ढांचे से यूसीबी बाहर होते हैं तो महज शेष ग्रामीण सहकारी बैंकों से यह क्षेत्र कमजोर हो जाएगा। नैशनल फेडरेशन ऑफ स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक्स से प्राप्त आंकड़ों में कहा गया है कि डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक्स (डीसीसीबी) का कुल एनपीए 31 मार्च 2016 के अंत में 224 अरब रुपये पर था जबकि स्टेट को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए यह आंकड़ा 51.47 अरब रुपये था।
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