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चाय निर्यात में 22 फीसदी वृद्धि की डगर मुश्किल

अभिषेक रक्षित | कोलकाता Aug 27, 2017 09:51 PM IST

अगले तीन सालों में चाय निर्यात का आधिकारिक लक्ष्य भले ही 22 प्रतिशत तक इजाफे का हो लेकिन चाय उत्पादकों और निर्यातकों को दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पहला, बढ़ती मांग के सामने चाय की परंपरागत किस्म का उत्पादन निष्क्रिय पड़ा है। दूसरा, केन्या और श्रीलंका ने भारत के प्रमुख लक्षित बाजारों को नष्टï कर दिया है। उद्योग के सूत्रों ने कहा कि टी बोर्ड ऑफ इंडिया और निर्यातकों ने ऐसे सात देशों या क्षेत्रों की पहचान की है जहां लक्ष्य प्राप्ति के लिए निर्यात बढ़ाया जा सकता है। ये हैं - कजाकिस्तान, रूस, अमेरिका, चीन, ईरान, मिस्र और लैटिन अमेरिका। इन्हें संयुक्त रूप में 'क्रुशियल' के रूप में जाना जाता है। वार्षिक चाय व्यापार में फिलहाल इनका योगदान 22.25 करोड़ किलोग्राम के साथ 53 प्रतिशत रहता है।

 
भारत का ध्यान प्रमुख रूप से चाय की सीटीसी (क्रश, टीअर, कर्ल) किस्म पर केंद्रित रहता है। निर्यात की मात्रा में इसका अनुमानित योगदान करीब 80 प्रतिशत रहता है। हालांकि वैश्विक स्वाद में चाय की परंपरागत किस्म के पक्ष में परिवर्तन हो रहा है। इस बात का आभास होने के बाद टी बोर्ड ने उत्पादकों से इस किस्म के विकल्प का अधिक चुनाव करने को कहा है। इसके लिए बोर्ड विशेष सब्सिडी भी उपलब्ध करवा रहा है। उत्पादकों की व्यापारिक संस्था इंडियन टी एसोसिएशन के अध्यक्ष आजम मोनेम का कहना है कि इस सब्सिडी में इजाफा किए जाने की जरूरत है। परंपरागत चाय की उत्पादन लागत काफी ज्यादा होती है। चाय बागानों को परंपरागत उत्पादन में स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित करने को प्रति किलोग्राम दो रुपये की सब्सिडी को कम से कम 20 रुपये किए जाने की दरकार है।
 
अनुमानित तौर पर एक औसत के रूप में परंपरागत चाय उत्पादन सीटीसी किस्म की तुलना में प्रति किलोग्राम 20 रुपये तक महंगा होता है। एक बागान मालिक ने कहा कि मौजूदा वक्त में कुल उत्पादन की मात्रा में 45 प्रतिशत योगदान करने वाले छोटे उत्पादक सीटीसी का ही उत्पादन करते हैं। इसलिए परंपरागत चाय उत्पादन की जिम्मेदारी बागानों पर आ जाएगी।
 
पिछले कुछ सालों के दौरान भारत ने अपनी सीटीसी का बाजार भी प्रमुख रूप से केन्या के हाथों गवांया है। दूसरी ओर सिलोन चाय ब्रांड का व्यापार करने वाले श्रीलंका ने भी आक्रामक ढंग से इन बाजारों में दस्तक दी है। 2011-2017 के दौरान केन्या का चाय निर्यात 14 प्रतिशत उछल कर 48.03 करोड़ किलोग्राम हो गया, जबकि 2016 में भारत का निर्यात चार प्रतिशत बढ़कर 22.25 करोड़ किलोग्राम हुआ।
 
जहां भारत ने सीटीसी पर ध्यान दिया है, वहीं श्रीलंका पहले की तुलना में 25 प्रतिशत रकबा खोने के बावजूद परंपरागत उपभोग करने वाले बाजारों पर अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहा है। रूस, ईरान, पश्चिमी एशिया और जर्मनी में इस चाय की ज्यादातर प्रतिस्पर्धा सीधे भारत की असम और दार्जिलिंग की परंपरागत चाय के साथ होती है। इन सभी में भारत की मजबूत पकड़ रही है।
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