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कपड़ा कंपनियों का लाभ दूसरी तिमाही में सुधरेगा

दिलीप कुमार झा | मुंबई Sep 03, 2017 10:10 PM IST

अप्रैल-जून तिमाही में कमजोर मुनाफे के बाद कपड़ा कंपनियां जुलाई-सितंबर तिमाही से अपने लाभ में सुधार की उम्मीद कर रही हैं। इसकी वजह यह है कि कपड़ा कंपनियों के ग्राहकों की तादाद बढ़ी है और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बाद कारोबारी फिर से माल का स्टॉक कर रहे हैं।  इस साल 1 जुलाई से जीएसटी लागू होने से पहले कारोबारियों के अपना स्टॉक खत्म करने से चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कपड़ा कंपनियों के लाभ मार्जिन पर दबाव रहा। नहीं बिक सकने वाले माल पर अतिरिक्त जीएसटी के डर से कपड़ा कंपनियों के पास स्टॉक की बड़ी मात्रा में वापसी हुई।  इसके नतीजतन जून 2017 में समाप्त तिमाही के दौरान न केवल छोटी बल्कि बड़ी कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव रहा। 

 
उदाहरण के लिए अप्रैल-जून तिमाही में वर्धमान टेक्सटाइल्स और वेलस्पन इंडस्ट्रीज का शुद्ध लाभ क्रमश: 7.19 फीसदी और 38.39 फीसदी घटा। व्यापक उत्पाद पोर्टफोलियो और बाजार की जरूरतों के मुताबिक बदलाव की क्षमता की बदौलत ग्रासीम इंडस्ट्रीज का शुद्ध लाभ 9.48 फीसदी बढ़ा। मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के मुताबिक वीएसटी खंड में आमदनी सुधरने से कंपनी के लाभ में सुधार हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रासीम इंडस्ट्रीज के लिए कपड़ा खंड में मात्रात्मक वृद्धि सपाट रही। 
 
सतलज टेक्सटाइल्स ऐंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड चेयरमैन सी एस नोपानी ने कहा, 'वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही में घरेलू माहौल के दबाव का कपड़ा क्षेत्र पर प्रतिकूल असर बरकरार रहा। नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी लागू होने की आहट से इस तिमाही में मांग प्रभावित हुई। जीएसटी लागू होने से असंगठित क्षेत्र प्रभावित हुआ है, जो कपड़े पर इसे हटाने और इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर के समाधान की मांग कर रहे हैं।' 
 
सरकार ने नवंबर 2016 में 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद करने की घोषणा की थी, जिसकी वजह से नकद कारोबार थम गया था। कपड़ा कारोबारियों विशेष रूप से कपड़े एवं धागे के कारोबारियों ने उन पर 5 फीसदी जीएसटी लगाए जाने के विरोध में 40 दिनों तक हड़ताल की थी। अब तक ये कारोबारी कोई कर नहीं दे रहे थे, इसलिए जीएसटी के नियमों का पालन उनके लिए बड़ी चुनौती साबित हुआ। 
 
कारोबारी जीएसटी वापस लेने की मांग कर रहे थे, लेकिन सरकार ने उनकी मांग पर फिर से विचार करने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद कारोबारियों ने जुलाई में नए कर नियमों के पालन के बाद अपना कारोबार शुरू किया, जिसके दूसरी तिमाही में कंपनियों की बिक्री के लिहाज से सकारात्मक नतीजे आने के आसार हैं।  विश्लेषकों का मानना है कि घरेलू और विदेशी बाजारों से मांग फिर आनी शुरू होने पर कपड़ा क्षेत्र में कारोबार सामान्य स्तर पर आ जाएगा। इसके अलावा इस साल अच्छे उत्पादन के अनुमानों से कीमतें घटने का अनुमान है। पिछले साल कम उत्पादन के कारण कपास के दाम ऊंचे रहे थे। 
 
एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड के विश्लेषक सुमंत कुमार ने ट्रिडेंट लिमिटेड पर अपनी एक रिपोर्ट में कहा, 'कपास की ज्यादा बुआई से इसकी कीमतें कम रहेंगी। हालांकि मुद्रा के मोर्चे पर घरेलू कपड़ा विनिर्माताओं के सामने चुनौती बरकरार रहेगी क्योंकि अप्रैल 2016 से जून 2017 के बीच डॉलर के मुकाबले रुपया 2.7 फीसदी मजबूत हुआ है। चीनी मुद्रा युआन के खिलाफ प्रतिकूल माहौल का सभी भारतीय कपड़ा विनिर्माताओं पर असर पड़ रहा है। कपास की ऊंची कीमतें भी भारतीय कपड़ा कंपनियों के लिए चुनौती रही हैं। हालांकि आगामी सीजन में आपूर्ति बढऩे का अनुमान है, जिससे कीमतों में 5 से 10 फीसदी नरमी आने के आसार हैं। अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति के मुताबिक वर्ष 2017-18 में भारत में कपास का कुल रकबा 7 फीसदी बढ़कर 1.13 करोड़ हेक्टेयर रहने का अनुमान है, जिससे कपास के दाम नियंत्रित बने रहने के आसार हैं।'
 
कपड़ा मंत्रालय के तहत आने वाली इस क्षेत्र की शीर्ष संस्था कपास सलाहकार बोर्ड का अनुमान है कि भारत में वर्ष 2016-17 में कपास का उत्पादन 3.45 करोड़ गांठ रहने का अनुमान है, जो इससे पिछले साल 3.32 करोड़ गांठ रहा था। रकबे में बढ़ोतरी के चलते कपास का उत्पादन 2017-18 में ज्यादा रहने के आसार हैं।
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