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दलहन किसानों की आमदनी घटी

राजेश भयानी | मुंबई Sep 06, 2017 10:15 PM IST

दालों के रिकॉर्ड उत्पादन के कारण वर्ष 2016-17 में दलहन किसानों के लाभ मार्जिन में औसतन 16 फीसदी गिरावट आई है। क्रिसिल रिसर्च की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। एजेंसी ने दलहन कीमतों में उतार-चढ़ाव और चक्र को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें कहा गया है कि चने को छोड़कर अन्य दालों में मार्जिन 30 फीसदी कम हुआ है। जहां दलहनों की बिक्री कीमत में गिरावट आ रही है, वहीं इसकी उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। कृषि वर्ष (जुलाई से जून) 2016-17 में लागत 3.7 फीसदी बढ़ी है, जबकि पिछले साल लागत में 2.8 फीसदी इजाफा हुआ था। इसलिए केंद्र सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी से किसानों की आय में गिरावट नहीं रुक पाई। 
 
वर्ष 2016-17 में दलहन उत्पादन 229.5 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर रहा, जो 2015-16 से करीब 40 फीसदी और 2013-14 के पिछले रिकॉर्ड उत्पादन से 19 फीसदी अधिक था। इस अध्ययन में कहा गया है कि साफ तौर पर सरकार दलहन की कीमतों में उतार-चढ़ाव के चक्र पर काबू पाने में अक्षम रही है। क्रिसिल में मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने कहा, 'ऐसा करना इसलिए अहम है क्योंकि भारत में परिवारों के कुल खाद्य खर्च में दलहन का हिस्सा 5 फीसदी है और पिछले 12 वर्षों के दौरान दालों की कीमतों में औसत सालाना महंगाई 12 फीसदी रही है।'
 
परिवारों के खाने के बजट और महंगाई के बास्केट में बड़ा हिस्सा होने के बावजूद सरकार अब तक इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव के चक्र पर अंकुश लगाने में नाकाम रही है। जोशी ने यह भी कहा, 'इस उतार-चढ़ाव के चक्र से उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही प्रभावित होते हैं। अब सरकार को प्रभावी एमएसपी, खुली व्यापार नीति और उचित ढंग से चलने वाले बाजारों के जरिये कीमतों को उचित स्तर पर लाने की दिशा में काम करना चाहिए। इसके साथ ही वैकल्पिक सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाकर इस फसल को जोखिम-मुक्त किया जाए।'
 
पिछले साल पांच मुख्य दलहनों का एमएसपी औसतन 12 फीसदी बढ़ाया गया था, लेकिन इसके बावजूद दलहनों (चने को छोड़कर) के थोक दाम 8 फीसदी गिरे। भारी उत्पादन और सस्ते आयात के कारण 2017 के कटाई सीजन में अरहर और मूंग की बाजार कीमतें एमएसपी से नीचे गिर गई थीं। अक्टूबर 2016 से फरवरी 2017 के बीच कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना की प्रमुख थोक मंडियों में अरहर और मूंग की मॉडल कीमतें एमएसपी से नीचे थीं। इसके नतीजतन बीते शुक्रवार तक दलहन का रकबा घटकर 137.6 लाख हेक्टेयर रहा है, जो पिछले साल इस समय तक 143 लाख हेक्टेयर था। 
 
भारत में कीमतों में खपत की मात्रा घटती-बढ़ती है, इसलिए दालों के दाम कम होने से इनकी खपत भी बढ़ी है। आम तौर पर देश में हर साल औसतन 40 लाख टन दालों का आयात होता है और घरेलू उत्पादन करीब 180 लाख टन होता है। हालांकि 2016-17 में 230 लाख टन उत्पादन के बावजूद आयात 60 लाख टन का स्तर पार कर गया है। क्रिसिल ने बहु-स्तरीय रणनीति बनाने का सुझाव दिया है। इसने कहा है कि चने के दाम एमएसपी से ज्यादा नीचे नहीं आए हैं, इसलिए आम तौर पर यह दलहनों में सबसे अच्छा मुनाफा देता है। इसकी वजह यह है कि इसका कुल उत्पादन में 40 से 45 फीसदी और दलहनों के निर्यात में 60 फीसदी हिस्सा होता है। रिपोर्ट में कहा गया है, 'इसके निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं है, इसलिए यह किसानों को ज्यादा मुनाफा देता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में घरेलू मांग से अतिरिक्त आपूर्ति को खपाने की गुंजाइश होती है।' 
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