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कपास में जगी बारिश की आस

रॉयटर्स | नई दिल्ली Sep 19, 2017 09:01 PM IST

मध्य भारत के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में बारिश के स्तर में सुधार की संभावना है। देश के मौसम विभाग के प्रमुख ने आज को रॉयटर्स को यह जानकारी दी। बढ़ती मांग के बीच कपास में भाग्य आजमाने वाले किसानों को इससे राहत मिलेगी। भारतीय मौसम विभाग की वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार 1 जून के बाद से देश की कुल वर्षा दीर्घावधि औसत से छह प्रतिशत कम है। मौसम विभाग ने कहा कि जून में मॉनसूनी बारिश से इस साल दीर्घावधि औसत के 98 प्रतिशत वर्षा की उम्मीद थी। देश की सालाना बारिश की करीब दो-तिहाई पूर्ति इसी से होती है। जून से सितंबर तक चलने वाला यह मॉनसून भारत के 26 करोड़ किसानों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि इनमें से करीब आधे किसानों की जमीन पर सिंचाई सुविधा का अभाव है। भारत की दो लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था में खेती का योगदान 15 प्रतिशत रहता है और इसके 1.3 अरब लोगों में से आधे से ज्यादा को कृषि से रोजगार मिलता है।
 
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार ग्रीष्म काल के दौरान गत सप्ताह तक कृषि का कुल क्षेत्र काफी हद तक पिछले साल के समान लगभग 10.5 करोड़ हेक्टेयर रहा है। तिलहन और दलहन की रोपाई धीमी पडऩे से कपास की रोपाई में काफी जोर रहा है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कम सिंचाई वाले कपास उत्पादक क्षेत्रों में औसत से कम बारिश हुई है। इसने मांग में उछाल की वजह से कपास की अधिक खेती करने वाले किसानों के लिए डर पैदा कर दिया है। मौसम विभाग के प्रमुख केजे रमेश ने कहा कि इस स्थिति में परिवर्तन होना तय है। इसमें पहले ही सुधार के संकेत दिख चुके हैं। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में बारिश में महत्त्वपूर्ण उछाल दिखेगी। 
 
हालांकि विदर्भ और पूर्वी मध्य प्रदेश के सूखाग्रस्त कपास उत्पादक क्षेत्रों में बारिश अब भी औसत से कम है, लेकिन इस सप्ताह बारिश की अल्पता में कमी आई है। कपास उत्पादन में शीर्षस्थ और दूसरे सबसे बड़े कपास निर्यातक भारत में कपास उत्पादन का सीधा संबंध मॉनसून से होता है क्योंकि कपास की खेती के तहत आने वाला 60 प्रतिशत से ज्यादा का हिस्सा बारिश के पानी पर निर्भर रहता है।
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