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ग्वार को मंदी में जाने का गम

नम्रता आचार्य | कोलकाता Oct 16, 2017 10:21 PM IST

ग्वार गम के निर्यात में गिरावट से इस जिंस के घरेलू दामों में भी गिरावट आ रही है। इसके अलावा, नई फसल की आवक के कारण आने वाले महीनों के दौरान ग्वार बीज के दामों में और गिरावट आने की संभावना है। भारत में उत्पादित 50 प्रतिशत से ज्यादा ग्वार का निर्यात शेल गैस अन्वेषण में इस्तेमाल के लिए पश्चिमी देशों को किया जाता है। अनौपचारिक अनुमानों के अनुसार, इस वर्ष भारत में तकरीबन 10 लाख टन ग्वार उत्पादन की संभावना है जो करीब-करीब पिछले वर्ष के ही समान है। इसके अतिरिक्त, लगभग 10 लाख टन पिछले वर्ष का बचा हुआ स्टॉक है। इससे भी दामों में गिरावट आ रही है।

 
ग्वार व्यापारियों के अनुसार, पिछले 20 दिनों के दौरान ग्वार बीज के दाम तकरीबन 5-10 रुपये प्रति किलोग्राम तक गिर चुके हैं। फिलहाल, ग्वार बीज के दाम प्रति किलोग्राम 36 रुपये के आसपास चल रहे हैं, जबकि करीब 20 दिन पहले इसके दाम प्रति किलोग्राम 40-46 रुपये थे। इसी तरह, ग्वार गम के दाम प्रति क्विंटल करीब 8,000 रुपये से गिरकर लगभग 7,800 रुपये पर आ चुके हैं। ग्वार की अंतरराष्ट्रीय मांग में कमी आने की एक वजह अमेरिका में शेल ऑयल के उत्पादन में आ रही गिरावट है। इस कारण आपूर्ति की अधिकता और दामों में गिरावट आ रही है। शेल गैस अन्वेषण में ग्वार गम एक आवश्यक घटक होता है।
 
विकास डब्ल्यूएसपी के प्रबंध निदेशक बीडी अग्रवाल ने कहा कि इस साल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ग्वार गम की मांग नहीं है, क्योंकि कच्चा तेल करीब 50 डॉलर प्रति बैरल पर है। यह हर शेल ऑयल क्षेत्र के लिए व्यावहारिक नहीं है। इस कारण, ग्वार की अंतरराष्ट्रीय मांग काफी कम है। अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच मनमुटाव की वजह से विश्व अर्थव्यवस्था में संभावित मंदी एक अन्य बड़ा मसला है। इस वजह से आने वाले महीनों के दौरान ग्वार के दामों में और कमी आने का हमारा अनुमान है।
 
ग्वार की नई फसल की आवक अक्टूबर की शुरुआत में शुरू हो जाती है और नवंबर के आखिर तक चलती है। इस साल मार्च-अप्रैल के आसपास कमजोर मॉनसून की आशंका से ग्वार के दामों में मजबूती आ गई थी। हालांकि जुलाई-अगस्त में अच्छी बारिश से बढिय़ा उपज हुई जिससे लगभग सामान्य उपज हुई। कृषि-कारोबार के सलाहकार गणेश प्रजापत ने कहा कि सामान्यत: अक्टूबर की शुरुआत में जब नई फसल आती है, तो दामों में गिरावट आनी शुरू हो जाती है। मार्च और अप्रैल के बाद नई फसल उपलब्ध नहीं होती, इस कारण कीमतें चढ़ जाती हैं। इस साल कम बारिश का पूर्वानुमान जताया गया था इसलिए पहले दाम चढ़ रहे थे। अब कच्चे तेल के कम दामों की वजह से प्राकृतिक गैस अन्वेषण की जरूरत कम है इसलिए ग्वार की कीमतों में गिरावट आई है। केडिया कमोडिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी सूत्रों ने बताया कि 2016-17 में ग्वार निर्यात 4,23,283 टन था, जबकि 2015-16 में यह 3,25,251 टन था। इस साल मार्च में इसमें करीब 56,000 टन का इजाफा हुआ जो जनवरी 2015 के बाद से सर्वाधिक था।
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