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कारोबारी निराशा से बाजार में चना बेदम

सुशील मिश्र | मुंबई Oct 27, 2017 10:07 PM IST

लगातार हो रही बिकवाली के चलते चने के दाम पांच हजार रुपये के नीचे पहुंच गए। वायदा बाजार में चना एक बार फिर निचले सर्किट का शिकार हो गया। पिछले एक महीने में चना 1,500 रुपये तक टूट चुका है। बाजार में फैली निराशा के चलते फिलहाल यह गिरावट थमने वाली भी नहीं है। चने के साथ दूसरी दलहन फसलों की कीमतें भी टूट रही है। वायदा बाजार में चना आज पांच हजार के नीचे पहुंच गया। एनसीडीईएक्स पर चना अनुबंध गिरकर 4,976 रुपये, दिसंबर 4,844 रुपये, जनवरी 4,762 रुपये और मार्च अनुबंध 4,470 रुपये क्विंटल पहुंच गया। वायदा की गिरावट का असर हाजिर बाजार पर भी दिखा जहां चने का भाव गिरकर 4900 रुपये क्विंटल हो गया जो एक महीने पहले 6,450 रुपये था। इस साल चने का समर्थन मूल्य 4,200 रुपये घोषित किया गया है।
 
पिछले एक महीने में वायदा बाजार में चने के दाम करीब 20 फीसदी गिरे हैं जबकि हाजिर बाजार में चना 24 फीसदी टूट चुका है। चने के साथ दूसरी दलहन फसलों में भी गिरावट आ रही है। पिछले एक महीने में तुअर (अरहर) 10 फीसदी, मूंग और उड़द की कीमतों में करीब 15 फीसदी गिरावट आई है।  मूंग तो सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे 4,400 रुपये तक पहुंच चुका है जबकि उसका एमएसपी 4,525 रुपये है। दलहन में सबसे ज्यादा गिरावट मोठ में हुई है जो इस समय 2,500 रुपये क्विंटल पर है जबकि पिछले साल इसकी कीमत 9,000 रुपये क्विंटल थी। मोठ की फसल मुख्य रुप से राजस्थान में होती है। बाजार में बिकने वाले पापड़ में करीब 80 फीसदी पापड़ मोठ दाल से ही बनाए जाते हैं। सरकार ने मोठ का एमएसपी भी तय नहीं किया है। 
 
दलहन की कीमतों में गिरावट फिलहाल थमती नजर नहीं आ रही है। कारोबारियों का कहना है कि दलहनों के आयात पर बंदिश और दालों का निर्यात खोलने के बावजूद बाजारों में तेजी तो दूर, मंदी भी थमती नजर नहीं आ रही है। इस कारण नए सीजन में चना समर्थन भाव से नीचे जा सकता है। सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीद के साथ बिक्री करने से दलहन ने बाजारों की स्थिति खराब कर दी है।
 
कीमतों में गिरावट की वजह कमजोर मांग को बताया जा रहा है लेकिन बड़े कारोबारी इससे सहमत नहीं है। बीकानेर उद्योग मंडल के पुखराज चोपड़ा कहते हैं कि बाजार में मांग नहीं ह,ै यह कहना गलत होगा क्योंकि खाने-पीने की सामान की मांग हमेशा रहती है।  पहली बार ऐसा देखा जा रहा है कि कृषि जिंसों में पूरी तरह मंदी है। लोग कमोडिटी बाजार से पैसा निकालकर शेयर बाजार में लगा रहे हैं। 
 
गिरावट की प्रमुख वजह सरकार की नीतियों में स्थिरता नहीं होना है। इस कारण कारोबारियों में निराशा का माहौल है। दाल मिलें बंद हो रही हैं या बंदी के कगार पर हैं। चने में धीरे धीरे गिरावट होती रहेगी और यह टूटकर 4,500 रुपये क्विंटल तक जा सकता है।  मुंबई में दालों के कारोबारी मेहुल शाह कहते हैं कि एक तरफ कारोबार ठंडा और लाभ में कमी और दूसरी ओर खर्चे में वृद्धि से व्यापारी आहत हैं। नियमों में बार-बार परिवर्तन से यह समस्या जटिल होती जा रही है। सरकार कह रही है कि उसके पास 18 लाख टन का स्टॉक है जिसे वह खुले बाजार में बेचेगी। इस कारण कोई भी कारोबारी फिलहाल खरीदारी के मूड में नहीं है। स्टॉकिस्ट भी माल निकालने में लगे हैं। 
 
इस साल देश में दलहन फसलों का उत्पादन बेहतर है और पिछले साल का स्टॉक भी बचा हुआ है। यानी देश में होने वाली कुल खपत से कहीं ज्यादा दलहन का स्टॉक है जो आने वाले समय में भी कीमतों को बढऩे नहीं देगा और  भाव गिरेंगे।  देश में हर साल करीब 240 लाख टन दाल की खपत होती है। इस साल 221 लाख टन दलहन की रिकार्ड पैदावार हुई है। करीब 20 लाख टन दलहन का पुराना स्टॉक है। साल 2016-17 में 57 लाख टन दालों का आयात किया था। 
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