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कपड़ा मिलों ने घटाया कपास भंडार

दिलीप कुमार झा | मुंबई Oct 31, 2017 09:23 PM IST

इस साल के पहले छह महीने कमजोर रहने के बाद घरेलू कपड़ा मिलों ने कपास भंडारण अवधि में तीन-चौथाई कटौती की है। इसका मकसद दूसरी छमाही में बेहतर मुनाफा हासिल करना है। दरअसल इस समय कपड़ा मिलें घरेलू और वैश्विक बाजारों से कम मांग आने के कारण मुश्किल दौर से गुजर रही हैं।
इस साल अच्छे उत्पादन की वजह से कपास की कीमतें सालभर कम रहने के आसार हैं, इसलिए घरेलू कपड़ा मिलें चालू सीजन में एक से डेढ़ महीने की खपत लायक कपास का ही भंडारण कर रही हैं। पहले वे छह महीनों की खपत जितनी कपास का भंडारण करती थीं। कपड़ा मिलें कपास के उत्पादन और कीमतों सहित बाजार की स्थितियों के आधार पर इसकी खरीद की रणनीति बनाती हैं।
सौराष्ट्र (गुजरात) के हाजिर बाजार में केवल मंगलवार को ही कपास के दाम 600 रुपये गिरकर 37,700 रुपये प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) पर आ गए। महाराष्ट्र में भी मंगलवार को कपास के दाम 500 रुपये टूटकर 37,300 रुपये प्रति कैंडी पर बंद हुए। बाजारों में खरीदार न होने के कारण मंगलवार को देश की सभी प्रमुख मंडियों में कपास की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। अक्टूबर में कपास के दाम 2 फीसदी से अधिक कम हो चुके हैं।
देश में डाइड यार्न और मूल्य संवर्धित कपड़ों की सबसे बड़ी विनिर्माता सतलज टेक्सटाइल्स ऐंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अध्यक्ष एस के खंडेलिया ने कहा, 'पहले से इतर अब अच्छा कपास घरेलू और वैश्विक बाजारों में पूरे वर्ष भर उपलब्ध रहता है। बड़े किसान और जिनर कटाई के वर्तमान सीजन में कपास का भंडारण करते हैं ताकि वे कीमतें बढऩे पर कम आपूर्ति के सीजन में बिक्री कर सकें। हम पिछले साल तक बड़ी मात्रा में कपास का भंडारण करते थे, जो करीब छह महीने की खपत के बराबर होता था। इसकी वजह आगे कीमतें बढऩे की संभावना थी और पिछले साल कीमतें बढ़ी भी थीं। हालांकि इस साल कपास के दाम कमजोर रहने के आसार हैं और इसलिए हम महज 30 से 45 दिन की खपत लायक कपास का ही स्टॉक कर रहे हैं। इससे हमें कपास पर लागत कम करने में मदद मिलेगी। इससे हमारे हाथ में ज्यादा पैसा रहेगा, जिसका हम अन्य कार्यों में इस्तेमाल कर सकते हैं। हमारी कंपनी के पास कच्चे माल की खरीद और उत्पादन बढ़ाकर या विलय के जरिये वृद्धि के लिए 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की अतिरिक्त नकदी है।'
इस बीच घरेलू और विदेशी मांग में मंदी की समस्या से निजात दिलाने के लिए सरकार ने पावरलूम के लिए 'साथी' योजना शुरू की है और कपड़ों पर आयात शुल्क बढ़ाया गया है। सूती कपड़ा निर्यात संवर्धन परिषद (टेक्सप्रोसिल) के चेयरमैन उज्ज्वल लाहोटी ने कहा, 'यह सही दिशा में कदम है क्योंकि देश में कच्चे माल और तकनीक कौशल की भरपूर उपलब्धता को देखते हुए यहां कपड़े का उत्पादन और निर्यात बढ़ाने की भारी संभावनाएं हैं। अगर प्रोत्साहनों के मामले में कपड़े को परिधानों और मेड-अप्स के बराबर माना जाए तो कपड़े के निर्यात में भारी इजाफा हो सकता है। हालांकि इन प्रोत्साहनों और पिछले 7 वर्षों में बुनाई क्षमता में 12 फीसदी बढ़ोतरी के बावजूद कपड़ों के उत्पादन में 3.58 फीसदी कमी आई है क्योंकि विभिन्न लागतों, राज्य शुल्कों के रिफंड न होने और यूरोपीय संघ के बाजारों में पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम जैसे देशों से निर्यात पर कोई शुल्क न लगने के कारण भारतीय कपड़े का निर्यात प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पा रहा है।'
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा का अनुमान है कि कपड़ा कंपनियों के मुनाफे पर दबाव अक्टूबर-दिसंबर तिमाही से कम होगा क्योंकि इस साल सितंबर के मध्य से कपास की कीमतें गिर रही हैं।

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