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प्रतिबंध के डर से समुद्री खाद्य निर्यात में गिरावट

निर्माल्य बेहड़ा | भुवनेश्वर Oct 31, 2017 09:24 PM IST

भारतीय मत्स्य उत्पादों पर यूरोपीय संघ (ईयू) के प्रतिबंध को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। इन हालात में भारतीय निर्यातकों को ईयू के देशों की मांग में खासी गिरावट का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, ये आयातक नवंबर में भारत का दौरा करने वाले यूरोपीय संघ के विशेषज्ञ दल की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। भारत का तीसरा सबसे बड़ा बाजार - ईयू भारतीय समुद्री खाद्य उत्पादों में एंटीबायोटिक दवाओं की उपस्थिति की वजह से इन पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है।
निर्यातकों का कहना है कि भारतीय मत्स्य उत्पादों पर विचाराधीन प्रतिबंध के कारण मांग में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट आई है। उनका कहना है कि इस साल यूरोपीय संघ में अवकाश सीजन की खरीदारी नहीं है। ओडिशा स्थित एक बड़ी निर्यातक कंपनी राम्स एसोर्टेड कोल्ड स्टोरेज लि. के प्रबंध निदेशक आदित्य दास ने कहा कि ईयू को किए जाने वाले मत्स्य उत्पाद निर्यात पर भावी प्रतिबंध के संबंध में बड़ी अनिश्चितता है। ईयू के कई खरीदरों ने वियतनाम और थाईलैंड जैसे अन्य स्रोत तलाश लिए हैं। अस्वीकार किए जाने के डर से बहुत से निर्यातकों ने ईयू को अपनी बिक्री घटा दी है। हर किसी को नवंबर में ईयू से आने वाले प्रतिनिधिमंडल के दौरे के नतीजे का इंतजार है।
ईयू भारत से आयातित समुद्री उत्पादों में एंटिबायोटिक दवा पाए जाने की बढ़ती घटनाओं की वजह से खफा नजर आ रहा है। 2016-17 में भारत से निर्यात किए गए 5.78 अरब डॉलर के कुल समुद्री निर्यात में ईयू का योगदान 18 प्रतिशत रहा। दास ने कहा कि कुछेक लोगों की गलती की वजह से सभी निर्यातकों और क्षेत्रों को सजा नहीं दी जानी चाहिए। इस मसले को सलझाने के लिए वाणिज्य मंत्रालय को एक अंतर-विभागीय समन्वित दृष्टिïकोण अपनाना चाहिए। व्यापार के सूत्रों ने कहा कि क्लोराफेनिकल, एओजेड, मेटाबोलिटीज और नाइट्रोफुरन्स जैसी एंटिबायोटिक दवाओं की उपस्थिति की वजह से भारतीय झींगा को अस्वीकार किया जाना बढ़ रहा है। लेकिन बाद में अस्वीकृति की दर में कमी आ गई। यह भी माना जा रहा है कि यूरोपीय संघ आयोग सीधे उन फैक्टरियों पर भी प्रतिबंध लगाने जा रहा है जिनके उत्पाद अस्वीकृत कर दिए गए हैं।
एक अन्य निर्यातक ने कहा कि भारतीय समुद्री खाद्य उत्पादों पर प्रतिबंध की खबरें फैलने से मांग में गिरावट आई है। निर्यातक भी यूरोपीय देशों को निर्यात करने के इच्छुक नहीं हैं, क्योंकि ईयू द्वारा 10 प्रतिशत जांच को बढ़ाकर 50 प्रतिशत किए जाने के बाद आयातक चाहते हैं कि निर्यातक जांच का व्यय वहन करें।

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