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दलहन की खेती को दिया जाए बढ़ावा

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली Dec 31, 2017 09:20 PM IST

देश में किसानों की आमदनी को दोगुना करने के मसले पर बनी समिति ने केंद्र सरकार को मृदा स्वास्थ्य कॉर्ड के विस्तार, खेतों में जल स्वास्थ्य की स्थिति के परीक्षण का सुझाव दिया है। साथ ही समिति ने सिफारिश की है कि खेत की मिट्टी और उसकी सिंचाई के लिए मिलने वाले पानी की स्थिति को खाद के प्रबंधन से जोड़ा जाना चाहिए, जिससे पोषक तत्वों की बेहतर तरीके से आपूर्ति हो सके।  किसानों की आय दोगुनी करने के सिलसिले में तैयार की गई 14 खंडों की रिपोर्ट में से समिति ने 2 नए खंड जारी किए हैं। अब तक इस रिपोर्ट के 6 खंड जारी हो चुके हैं, जबकि शेष अभी तैयार किए जा रहे हैं। 
 
हाल का मसौदा कृषि क्षेत्र के टिकाऊपन और सेवाओं के विस्तार पर केंद्रित है। इसके पहले के जारी मसौदे में समिति ने अनुमान लगाया था कि भारत में कृषक परिवार की औसत वास्तविक आमदनी 2022-23 तक बढ़कर 2,19,724 रुपये सालाना हो सकती है जो 2015-16 में 96,703 रुपये थी। साथ ही सरकारी व निजी क्षेत्र से निवेश 2011-12 की कीमत पर 6.4 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। 2015-16 से 2022-23 के बीच किसानों की आमदनी में सालाना 10.41 प्रतिशत की बढ़ोतरी के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके लिए 2011-12 के मूल्य पर निजी क्षेत्र से 1.31 करोड़ रुपये अतिरिक्त निवेश और सरकारी क्षेत्र से 5.08 लाख करोड़ रुपये निवेश की जरूरत होगी। 
 
आलोचकों का कहना है कि 2002-03 से 2012-13 के बीच कृषि क्षेत्र की आमदनी महज 3.6 प्रतिशत सालाना बढ़ी है, जिसे देखते हुए 10 प्रतिशत से ऊपर कृषि क्षेत्र की आमदनी का लक्ष्य बहुत भारी भरकम है।  बहरहाल नए खंड में मसौदे में कहा गया है कि मिट्टी के पोषण के स्तर को बढ़ाने के लिए दलहन की खेती को प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत है, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी को पूरा किया जा सके।  मसौदा विधेयक में कहा गया है कि भूजल दोहन के लिए बोरवेल लगाने की वैधानिक अनुमति अनिवार्य किए जाने की जरूरत है। इसके अलावा पेयजल क्षेत्र को संरक्षित कि ए जाने सहित अन्य कदम राज्य सरकारों के साथ मिलकर तत्काल उठाए जाने की जरूरत है। इसमें कहा गया है कि देश के कृषि जलवायु क्षेत्र के फिर से श्रेणीकरण की जरूरत है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण इसमें बदलाव हुए हैं। इससे टिकाऊपन के लिए नए तरीके से रणनीति बनाने व कार्यक्रम चलाने में मदद मिलेगी। इसमें फसलोंं के तरीके और रणनीतियों में बदलाव करने व  मक्का गेहूं को बढ़ावा देने की जरूरत है, न कि सिर्फ धान व गेहूं की खेती जारी रखा जाना चाहिए, जैसा कि भारत में गंगा के मैदानी इलाकों में किया जाता है। 
 
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि किसानों को कॉर्बन क्रेडिट वितरण और सूखा मुक्त, आलू केंद्रित व कीट व बीमारियों से प्रतिरोधी बीज दिए जाने की जरूरत है।  विस्तार सेवाओं के बारे मेंं मसौदा रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि विस्तार सेवाओं को सहकारिता, कृषि उत्पादक कंपनियों और संगठनों के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि विस्तार सेवाओं के लिए खरीदार विक्रेता सम्मेलनों का आयोजन किया जाए।  मसौदे में कृषि विज्ञान केंद्रों की अतिरिक्त भूमि का इस्तेमाल किसानों के कृषि कारोबार संभावनाओं के विकास के लिए किया जाना चाहिए।  रिपोर्ट के मुताबिक, 'हर कृषि विज्ञान केंद्र के कब्जे में करीब 50 एकड़ जमीन है, जिनमें कृषि कारोबार इंटरप्राइजेज के विकास की संभावना है। इस तरह की पहल के लिए निर्देशक सिद्धांतों में 10 प्रतिशत धन के आवंटन की व्यवस्था की गई है।' किसान विज्ञान केंद्र सामान्यतया ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं, जहां किसानों को खेत में जानकारी की व्यवस्था होती है। भारत में करीब 680 कृषि विज्ञान केंद्र हैं, जिन्हें केंद्र सरकार या राज्य सरकारें संचालित करती हैं। 
 
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