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कपड़ा निर्यात के मुनाफे पर आशंका की सिलवटें

विनय उमरजी | अहमदाबाद Feb 21, 2018 09:55 PM IST

लाभ पर आघात

भारतीय कपड़ा निर्यातकों के लाभ में 200 से 300 आधार अंकों की कमी आने के आसार
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने जताई है यह आशंका
अमेरिका के खुदरा बाजार से कम आमदनी और प्रोत्साहनों में कमी से पड़ सकता है मुनाफे पर असर
अमेरिका में ई-रिटेल  कारोबार के जोर पकडऩे से पैदा हो रहे ऐसे हालात

अमेरिका के खुदरा विक्रेताओं से कम आमदनी होने और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद निर्यात प्रोत्साहन घटने से 2017-18 में भारतीय कपड़ा निर्यातकों के लाभ में 200-300 आधार अंकों (बीपीएस) की कमी आने के आसार हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने यह अनुमान जताया है।  ई-रिटेल या ऑनलाइन खुदरा कारोबार में तेजी की वजह से अमेरिका में कई परंपरागत खुदरा विक्रेताओं ने अपने स्टॉक और दुकानों की संख्या में कटौती की है। इसके फलस्वरूप उपयोग क्षमता में आ रही गिरावट को थामने के लिए भारतीय निर्यातक अमेरिका के ई-रिटेल कारोबारियों के साथ सौदे कर रहे हैं, लेकिन यह कीमतों पर दो रहे हैं। 

इसके अलावा, यूरोपीय बाजार में शुल्क-मुक्त पहुंच की सुविधा का फायदा उठाने वाले बांग्लादेश और पाकिस्तान से इतर, भारतीय कपड़ा निर्यातकों की प्रतिस्पर्धी क्षमता उनके उत्पादों पर लगने वाले 10 प्रतिशत शुल्क से प्रभावित होती है।  जीएसटी के बाद शुल्क वापसी की दर और राज्य शुल्कों में राहत (आरओएसल) को घटाकर 2 फीसदी कर दिया गया है, जो क्रमश: 7.5 और 3.9 प्रतिशत थे। इससे घरेलू कपड़ा कंपनियों पर असर पड़ा है। हालांकि, भारत वाणिज्यिक निर्यात योजना (एमईआईएस) के अंतर्गत प्रोत्साहन को दो प्रतिशत से बढ़ाकर चार प्रतिशत करने से आंशिक भरपाई की गई है।

क्रिसिल के वरिष्ठ निदेशक अनुज सेठी के अनुसार, इन सभी कारणों से 2017-18 में कपड़ा निर्यातकों के मुनाफे को आघात पहुंच सकता है। वित्त वर्ष 17 में एबिटा या परिचालन लाभ 19 प्रतिशत से गिरकर 16 प्रतिशत पर आ सकता है। सेठी ने कहा कि हमने 63 कंपनियों का अध्ययन किया है। इनमें 59 की रेटिंग क्रिसिल ने की है। भारत के घरेलू कपड़ा निर्यात में इनका योगदान 70 प्रतिशत रहता है। यह अध्ययन बताता है कि इस वित्त वर्ष में एमईआईएस के अंतर्गत राहत के बावजूद राजस्व प्रतिशत के रूप में औसत निर्यात प्रोत्साहन कम से कम 200 आधार अंकों तक कम रहेगा।

यह प्रभाव ऐसे समय में हो रहा है कि जब वित्त वर्ष 2017 में घरेलू होम टेक्सटाइल कंपनियों को सूती चादरों और टेरी टॉवल के अमेरिकी आयात में भारत की हिस्सेदारी में इजाफा नजर आया था। चीन और पकिस्तान की तुलना में प्रतिस्पर्धी लागत के मद्देनजर यह 34 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया था। क्रिसिल के अनुसार, 16 अरब डॉलर मूल्य के वैश्विक होम टेक्सटाइल बाजार में एक-तिहाई हिस्सा अमेरिका का रहता है। पिछले वित्त वर्ष में भारत के 5.3 अरब डॉलर के होम टेक्सटाइल निर्यात का लगभग 47 प्रतिशत अमेरिका को किया गया था। हालांकि, भारतीय घरेलू वस्त्रों की मांग में हाल में देखी गई आठ प्रतिशत की बढ़ोतरी जारी रहेगी। इसे पारंपरिक बाजारों में निर्यात करने और एशिया, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका तथा कनाडा जैसे गैर-पारंपरिक बाजारों में बेहतर ढंग से पैठ करने से मदद मिली थी।

क्रिसिल रेटिंग्स में एसोसिएट निदेशक राजेश्वरी कार्तिज्ञान ने कहा कि अभी भी स्वस्थ मांग को देखते हुए क्रिसिल को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2018 और 2019 में 63 कंपनियां क्षमता बढ़ाने के लिए 37 अरब रुपये तक व्यय करेंगी। यह बात काफी ध्यान देने वाली है कि पिछले दो वित्त वर्षों में 46 अरब रुपये पहले ही व्यय किए जा चुके हैं।
कीवर्ड textiles, कपड़ा एवं परिधान नीति,

  
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