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अदालत ने दी जूट उद्योग को 1,000 करोड़ रुपये की राहत

जयजित दास | भुवनेश्वर Feb 23, 2018 10:19 PM IST

सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2011 से 2013 के दौरान सरकारी एजेंसियों को आपूर्ति की गई जूट की बोरियों पर लगाए 1,000 करोड़ रुपये के केंद्रीय उत्पाद शुल्क से जूट उद्योग को राहत दे दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले में कहा कि यह मांग तथ्यहीन और असंबद्ध है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है। न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा के 2 सदस्यीय पीठ ने कहा कि उत्पाद शुल्क विभाग द्वारा की गई मांग वर्तमान मामले के तथ्यों पर आधारित नहीं थी। इससे पहले, केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग ने 1 मार्च 2011 से फरवरी 2013 के बीच आपूर्ति की गई जूट की बोरियों को लेकर जूट उद्योग से इस राशि की मांग की थी। इस मांग का नोटिस वर्ष 2015 में केंद्रीय उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय प्राधिकरण द्वारा जारी किया गया था। हालांकि इस निर्णय पर अदालत ने 2015 में ही रोक लगा दी थी। उद्योग से जुड़े एक स्रोत ने कहा, 'हम सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हैं। जूट उद्योग इस बात से खुश होगा कि फैसला काफी जल्दी आ गया।'

 
वर्ष 2004 से जूट की बोरियों पर उत्पाद शुल्क नहीं लगता था। हालांकि वर्ष 2011 में संप्रग -2 सरकार ने इस पर कीमत के अनुसार 10 प्रतिशत का कर लगा दिया और 2013 के बाद इसे फिर से वापस ले लिया गया। मार्च 2011 में कोलकाता के उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों ने पहले की अधिसूचना को संशोधित किया। इसके आधार पर उन्होंने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और दूसरी सरकारी एजेंसियों के द्वारा सरकार को आपूर्ति की गई जूट की बोरियों पर 10 प्रतिशत का शुल्क लगा दिया। इसमें कहा गया कि पीडीएस के तहत वितरित होने के लिए सरकार को उपलब्ध कराई गई जूट की बोरियां 'ब्रांडेड' श्रेणी में आती हैं और उत्पाद शुल्क अधिनियम के अध्याय 63 के तहत इन पर शुल्क लगाया जा सकता है।
 
इसके बाद, अनेक जूट मिलों को 15-30 करोड़ रुपयों तक के नोटिस मिलने लगे। पश्चिम बंगाल में लगभग 60 जूट मिल हैं। हालांकि कोलकाता के उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारी यह जानते थे कि जल्द ही इस शुल्क को सरकार द्वारा हटा लिया जाएगा, इसलिए वे नोटिस भेजकर मिल मालिकों को परेशान करने लगे। रिकॉर्ड के अनुसार 10 जूट मिलों को ऐसे नोटिस भेजे गए। केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय और जूट आयुक्त कार्यालय ने इस कदम को विरोध किया और नोटिस को जल्द से जल्द वापस लेने को कहा। उनका कहना था कि जूट की बोरियों पर छापे गए 6 सामान सरकार द्वारा तय मानकों के अनुरूप थे, इसलिए इन्हें 'ब्रांडेड' श्रेणी में नहीं रखा जा सकता और शुल्क नहीं लगाया जा सकता। जूट आयुक्त कार्यालय ने बताया कि बोरियों पर सामानों की छपाई से जूट मिलों को अपने उत्पाद के प्रोत्साहन में कोई सहायता नहीं मिली। जूट की बोरियों पर यह छपाई 4 जुलाई, 2002 के सरकारी आदेश के बाद शुरू हुई थी।
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