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सुर्खियों में है सोना आयात योजना

राजेश भयानी | मुंबई Mar 06, 2018 11:02 PM IST

कब क्या हुआ

जनवरी 2012 : सरकार ने सोना आयात शुल्क 2 फीसदी से बढ़ाकर 6 फीसदी कर दिया
मई 2013 : आरबीआई ने बैंकों की तरफ से खेप के आधार पर सोना आयात पर लगाई पाबंदी
22 जुलाई 2013 : आरबीआई ने 80:20 योजना की घोषणा की
अगस्त 2013 : सोने-चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाकर 10 फीसदी कर दिया गया
21 मई 2014 : राजग के जीतने लेकिन शपथ ग्रहण से पहले आरबीआई ने एक परिपत्र जारी कर स्टार ट्रेडिंग व एक्सपोर्ट हाउस की तरफ से होने वाले आयात को नरम बना दिया और ज्वैलरों को सोने पर कर्ज मुहैया कराने की अनुमति बैंकों को दी
28 नवंबर 2014 : 80-20 योजना समाप्त कर दी गई

वास्तविक सराफों व निर्यातकों की कीमत पर कई कंपनियों को हुआ फायदा

साल 2013, 13 मई यानी अक्षय तृतीया का दिन। आभूषण कारोबारी पिछले डेढ़ महीने में आयातित करीब 600 टन सोना बेचने में व्यस्त थे, लेकिन दोपहर में केंद्रीय बैंक ने परिपत्र जारी कर पाबंदी वाले युग की शुरुआत का संकेत दे दिया। इसने बैंकों से कहा कि वह खेप के आधार पर सोने का आयात न करे। इसने सोना-चांदी कारोबार के लिए स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम लागू होने के बाद सबसे ज्यादा विवादास्पद कदम की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। कई कंपनियां वास्तविक ज्वैलर व निर्यातकों की कीमत पर ऐसे आयात प्रतिबंध से लाभान्वित हुईं। अब राजनेता इसके लिए संप्रग सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम के कदमों से ऐसा हुआ।

धोखाधड़ी करने वाली गीतांजलि जेम्स व नीरव मोदी पर उंगली उठाते हुए केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने सोमवार को आरोप लगाया था कि जुलाई 2013 में शुरू की गई 80:20 स्वर्ण आयात योजना का पीएनबी घोटाले में योगदान रहा, जिसे मेहुल चोकसी व नीरव मोदी ने अंजाम दिया। हालांकि सराफा बाजार के दिग्गजों का कहना है कि मीडिया और राजनीतिक गलियारों में हुई चर्चा बेमानी है क्योंकि स्वर्ण आयात योजना चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने के नाम पर घोटाले का पहाड़ था, लेकिन हर कोई अभी गीतांजलि की बात कर रहा है। साथ ही यह योजना भयानक तरीके से नाकाम रही थी।

वास्तविक लाभार्थियों ने 100 टन से ज्यादा सोना 100 डॉलर से अधिक के प्रीमियम पर बेचा। वे गीतांजलि जैसी कई कंपनियां थी, जिसने लाभ हासिल किया। यहां तक कि उच्च एनपीए वाले सरकारी बैंकों के किसी अनाम आका ने निर्देश दिया कि वह खास ज्वैलर-रिफाइनर को प्रति आउंस कम प्रीमियम पर सोना बेच दे जबकि निजी क्षेत्र के बैंक भारी प्रीमियम पर सोना बेच रहे थे और उस समय यह 100 डॉलर प्रति आउंस था। उनके मुताबिक, सरकार शायद चाहती थी कि यह रकम निजी हाथों में जाए, न कि सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों को मिले।

क्या है 80:20 योजना?

यह योजना तब शुरू हुई जब सोने का आयात काफी तेजी से बढ़ रहा था और यह चालू खाते के घाटे पर असर डाल रहा था, जिसके चलते डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में तेजी से गिरावट आ रही थी और यह करीब 70 रुपये के आसपास था। सरकारी निर्देश के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने 22 जुलाई 2013 को परिपत्र जारी किया। इसमें कहा गया था कि आयातित सोने में से 20 फीसदी का निर्यात अनिवार्य होगा। निर्यात की शर्तें इस तरह की थी कि आयात की हर खेप निश्चित तौर पर आगे होने वाले आयात के लिए निर्यात की अनिवार्यता पूरी करे। एक्सपोर्ट जोन को इससे बाहर रखा गया था। ऐसे में आयातित 80 फीसदी सोने का इस्तेमाल देसी बाजार में किया जा सकता था, यानी 20 फीसदी का निर्यात जरूरी था।

क्या इससे चालू खाते का घाटा कम हुआ?

पाबंदी लागू होने से पहले अप्रैल व मई 2013 में 770 अरब रुपये का 294 टन सोने का आयात हुआ, जो रिकॉर्ड था और आयात का इतना बड़ा बिल दोबारा नहीं देखा गया। पाबंदी लगने के बाद के 10 महीने (2013-14) में कुल सोना आयात 325 टन रहा। जनवरी 2012 में सोने पर आयात शुल्क 300 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जिसे अगस्त 2013 में बढ़ाकर कीमत का 10 फीसदी कर दिया गया। इसके कारगर न होने से सरकार ने आयात पर पाबंदी का कदम उठाया। मई 2013 में के 300 टन के आयात के मुकाबले यह उस महीने में घटकर 10 टन रह गया जब 80:20 योजना शुरू की गई। हालांकि तस्करों ने काफी कमाई की क्योंकि उन्हें 10 फीसदी शुल्क का मार्जिन व प्रीमियम मिल रहा था और तब सोने की भारी किल्लत थी।

कीवर्ड अक्षय तृतीया, आभूषण, कारोबारी, ज्वैलर,

  
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