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कागज के बढ़ते आयात से घरेलू कंपनियों पर दबाव

टी ई नरसिम्हन | चेन्नई Mar 09, 2018 11:03 PM IST

बढ़ते आयात से स्थानीय कागज निर्माताओं पर दबाव बढ़ रहा है। उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि आयातित (मुख्य रूप से चीन से) और स्थानीय तौर पर निर्मित कागज की कीमतों के बीच 10 प्रतिशत का अंतर है जिससे घरेलू कागज कारोबार प्रभावित हो रहा है। पेपर और पेपरबोर्ड का आयात दिसंबर में समाप्त पहली तीन तिमाहियों के दौरान लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ा।

 

पेपर और पेपरबोर्ड का आयात अप्रैल-दिसंबर 2017 की अवधि में एक साल पहले के 10.5 लाख टन से बढ़कर 14.7 लाख टन पर पहुंच गया और पूरे वित्त वर्ष 2017 में आयात 14.2 लाख टन के आंकड़े को पार कर गया है। अप्रैल-दिसंबर में आसियान और दक्षिण कोरिया से पेपर और पेपरबोर्ड के आयात में वित्त वर्ष 2017 की समीक्षाधीन अवधि की तुलना में 73 प्रतिशत और 83 प्रतिशत की वृद्घि दर्ज की गई है। आसियान और दक्षिण कोरिया के साथ भारत ने मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) कर रखा है। 

 

समान अवधि में चीन से आयात 53 प्रतिशत तक बढ़ा। जहां आसियान से मुख्य आयात अनकोटेड राइटिंग और प्रिंटिंग पेपर का होता है वहीं दक्षिण कोरिया और चीन से कोटेड पेपर का आयात भारी मात्रा में होता है। वित्त वर्ष 2011 से वित्त वर्ष 2017 की 6 वर्ष की अवधि में पेपर और पेपरबोर्ड का आयात 18 फीसदी की सालाना चक्रवृद्घि दर से बढ़ा। भारत में कागज उत्पादन की लागत प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में काफी अधिक है। इसकी मुख्य वजह है यहां बिजली, कच्चे माल और अन्य सामग्री की ऊंची कीमतें। 

हालांकि भारत दुनिया में कागज के लिए सबसे तेजी से बढ़ रहे बाजारों में से एक है, लेकिन यह तेजी काफी हद तक आयात से मजबूत हो रही है। घरेलू निर्माता अपर्याप्त कच्चे माल की उपलब्धता और ऊंची ऊर्जा लागत जैसे कारकों की वजह से मजबूर हैं। इंडियन पेपर मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन (आईपीएमए) के अध्यक्ष सौरभ बांगुड़ ने कहा कि विदेशी निर्माताओं की निजी बागानों तक आसान पहुंच उपलब्ध है और वे विभिन्न एफटीए के तहत भारत को निर्यात के संदर्भ में अपने देशों में सस्ती ऊर्जा और शून्य आयात शुल्क का लाभ उठाते हैं। 

दूसरी तरफ, पल्प (कागज की लुगदी) की कीमतें भी 600 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 850 डॉलर पर पहुंच गईं और मौजूदा समय में ये कीमतें 760 डॉलर प्रति टन पर हैं। यह ध्यान देने की बात है कि कागज उद्योग पल्प का आयात कर रहा है क्योंकि यह घरेलू बाजार में उपलब्ध नहीं है।
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