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एमएसपी पर खरीदारी निजी कंपनियों के लिए नहीं आसान

संजीव मुखर्जी |  Mar 12, 2018 10:16 PM IST

... लेकिन उत्साहजनक नहीं रहा परिणाम
निजी कंपनियों को चावल, गेहूं के बजाय अन्य जिंसों की खरीदारी के लिए प्रोत्साहित करना चुनौतीपूर्ण

पिछले सप्ताह नीति आयोग और राज्य तथा केंद्र सरकारों के प्रतिनिधियों ने यह सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न विकल्पों पर चर्चा की कि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिले, जैसा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने 2018-19 के बजट भाषण में घोषणा की थी। एक आधिकारिक बयान के अनुसार जिन विभिन्न विकल्पों पर विचार-विमर्श किया गया, उनमें कमीशन के बदले में निजी कंपनियों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदारी का विचार अहम था। इस बयान के अनुसार नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का मानना था कि कुछ कमीशन निजी खरीद एजेंसियों को दिया जाना चाहिए, बशर्ते कि वे सरकार की ओर से खरीदारी करती हों और सभी अन्य नियमों पर अमल करती हों। आयोग अपने सुझावों को इस महीने के अंत तक पेश कर सकता है। 

हालांकि निजी कंपनियों को एमएसपी पर अनाज खरीदारी से जोड़ने की दिशा में पिछले कई वर्षों से काम होता रहा है और कई ठोस प्रयासों के बावजूद इसे लेकर अनुभव अब तक उत्साहजनक नहीं रहा है। इसके अलावा, निजी कंपनियों को सरकार की ओर से गेहूं और चावल के बजाय अन्य जिंसों की खरीदारी के लिए प्रोत्साहित करना चुनौतीपूर्ण जिनमें भंडारण और ढुलाई मुख्य रूप से शामिल हैं। 

कई लोगों का कहना है कि यह अवधारणा जोखिम से भरी है और संवर्धन परिचालन में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) का योगदान कम हो सकता है। मुख्य रूप से निजी क्षेत्र की एजेंसियां उन क्षेत्रों में एफसीआई के साथ पूरक की भूमिका निभा सकती हैं, जहां वह कमजोर है, लेकिन यह सिर्फ गेहूं और चावल के लिए होगा। निजी क्षेत्र को  जोड़ने की पहली कोशिश 2008 में की गई जब एफसीआई ओडिशा और कुछ अन्य राज्यों में धान की खरीदारी के लिए एनसीएमएसएल (जिसे अब एनसीएमएल के नाम से जाना जाता है) और एनबीएचसी से जुड़ा था। 

इसके बाद, 2016-17 में केंद्र ने एफसीआई के साथ मिलकर पूर्वी भारत  में धान की खरीद के लिए फिर से निजी क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया। इस बार, यह अधिक संगठित था। उसकी रूपरेखाओं पर व्यापक ढंग से काम हुआ। उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में क्लस्टर आधार पर चावल की खरीदारी के लिए तीन निजी कंपनियों को जोड़ा गया जिनमें नैशनल कॉलेटरनल मैनेजमेंट लिमिटेड (एनसीएमएल) भी शामिल थी। 

अन्य दो कंपनियां थीं वीरप्रभु मार्केटिंग लिमिटेड और फार्मर्स फॉच्र्यून (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड। तब खाद्य मंत्री राम विलास पासवान ने राज्य सभा में एक लिखित जवाब में कहा था कि गठित मानकों के अनुसार निजी कंपनियां एफसीआई को दैनिक खरीद रिपोर्ट सौंपने के लिए बाध्य हैं और एफसीआई को खरीद केंद्रों, भंडारण केंद्रों का निरीक्षण करने का अधिकार है। पासवान ने कहा था कि एफसीआई निजी कंपनियों के प्रदर्शन का आकलन करेगा और कमीशन आदि से जुड़ी खामियों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उन पर जुर्माना लगाएगा। 

इन कंपनियों को इलेक्ट्रॉनिक खरीदारी के 48 घंटे के अंदर किसानों को एमएसपी के हिसाब से भुगतान करना अनिवार्य है। एनसीएमएल को उत्तर प्रदेश के चार जिलों बलिया, मऊ, गाजीपुर और चंदौली से चावल खरीद के लिए एक क्लस्टर दिया गया था। वीरप्रभु मार्केटिंग को इलाहाबाद, कौशांबी, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर का क्षेत्र सौंपा गया।  इसी तरह फार्मर्स फॉच्र्यून (इंडिया) प्राइवेट को आंबेडकरनगर, बस्ती संत कबीरनगर और सिद्घार्थनगर को कवर करने वाला क्लस्टर सौंपा गया था। वहीं झारखंड में एनसीएमएल को छोटानगर और कोल्हन जिलों को कवर करने वाले दो क्लस्टर दिए गए। 

पश्चिम बंगाल में वीरप्रभु मार्केटिंग को खरीद के लिए चार क्लस्टर दिए गए जिनमें बांकुरा, बर्दवान, दिनाजपुर और सिलीगुड़ी जिले शामिल थे। इन अनुभवों की सफलता या विफलता का अभी भी आकलन किया जा रहा है। इसके अलावा, इनमें से ज्यादातर बड़ी खरीदारियां गेहूं और चावल के लिए थीं, जिसके लिए एफसीआई और अन्य के पास पर्याप्त भंडारण क्षमता थी। 

यदि इसी तरह के परिचालन में दलहन या तिलहन जैसे अन्य जिंसों को भी शामिल किया जाए तो भंडारण एक बड़ी चुनौती हो सकती है।  एफसीआई के पूर्व कृषि सचिव एवं चेयरमैन शिराज हुसैन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'धान और गेहूं के लिए, एफसीआई ने बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में पर्याप्त भंडारण क्षमता तैयार की है, इसलिए गेहूं और धान की खरीद संभव है और भंडारण को लेकर कोई बड़ी समस्या नहीं है। हालांकि यदि अन्य जिंसों की एमएसपी पर खरीदारी की जाए तो निश्चित तौर पर लगभग सभी राज्यों में जगह की किल्लत महसूस होगी।'

विशेषज्ञों की एक उच्च पदस्थ समिति ने अनाज के भंडारण और परिवहन में निजी क्षेत्र का योगदान बढ़ाने का सुझाव दिया था और साथ ही खरीद में एफसीआई के प्रयासों को पूरक बनाए जाने की भी बात की थी। दरअसल, एफसीआई में सुधार के लिए नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा विशेषज्ञों की एक उच्च पदस्थ समिति का गठन 2014 में प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद किया गया था।

आईसीआरआईईआर में कृषि मामलों के इन्फोसिस चेयर प्रोफेसर अशोक गुलाटी ने कहा, 'निजी क्षेत्र एमएसपी पर गेहूं, चावल या कोई अन्य जिंस मुफ्त में नहीं खरीदेगा और यदि कमीशन लागत की तुलना में कम हो तो वह तैयार नहीं होगा। मेरा मानना है कि यह सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार को लेकर काफी देर से जागी है।' गुलाटी पूर्व खाद्य मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता शांता कुमार की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की उच्च पदस्थ समिति के प्रमुख सदस्य थे। 

शिराज हुसैन का मानना है कि एमएसपी व्यवस्था से नुकसान होने की आशंका है और जब तक भारत सरकार यह आश्वासन नहीं देती कि वह नुकसान को सहन करेगी, तब तक निजी क्षेत्र इस दिशा में आगे आने के लिए तैयार नहीं होगा। जाने-माने खाद्य नीति विश्लेषक देवेंद्र शर्मा का कहना है कि निजी क्षेत्र सरकार की ओर से एमएसपी पर कृषि उत्पाद की खरीदारी में दिलचस्पी नहीं दिखाएगा।
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