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चीनी मिलें निर्यात का बना रहीं दबाव

दिलीप कुमार झा | मुंबई Mar 19, 2018 09:56 PM IST

चीनी की कीमतों में लगातार गिरावट से प्रभावित मिलों ने सरकार से न्यूनतम संकेतक निर्यात कोटा (एमआईईक्यू) फिर से लागू करने का आग्रह किया है। एमआईईक्यू को चीनी सीजन 2015-16 के लिए सितंबर, 2015 में लागू किया गया था। इसके तहत मिलों को एक निर्धारित समय सीमा में संयुक्त रूप से 40 लाख टन सफेद चीनी के निर्यात की मंजूरी दी गई थी। इसका मकसद देश में चीनी के सरप्लस को कम करना था। इस योजना के तहत किसी खेप को केंद्र मंजूरी देता है।  सरकार ने 2016-17 में कम चीनी उत्पादन के अनुमानों के बीच योजना लागू करने के छह महीनों के भीतर ही वापस ले ली। उस समय सरकार ने किसानों के खाते में सीधे 4.50 रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान भी किया था। चीनी उद्योग आग्रह कर रहा है कि इस साल भी वैसी या उससे खराब स्थिति है। पिछले चीनी सीजन (हर साल एक अक्टूबर को चीनी वर्ष शुरू होता है) की करीब 40 लाख टन चीनी बची हुई है, जबकि इस साल 40 से 45 लाख टन और अगले साल भी इतना ही सरप्लस उत्पादन होने का अनुमान है। भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'चालू सीजन में कम से कम 20 लाख टन सफेद चीनी के लिए एमआईईक्यू योजना को फिर लागू किया जाना चाहिए। इसके अलावा सरकार को अगले सीजन के लिए भी 40 लाख टन कच्ची चीनी के निर्यात की घोषणा करनी चाहिए ताकि उद्योग निर्यात के लिए प्रोत्साहित हो।'
 
चीनी उद्योग सरप्लस चीनी को लेकर चिंतित है, जो देश की सालाना खपत 250 लाख टन मानते हुए करीब 85 से 90 लाख टन रहने का अनुमान है। सरकार ने इस साल जनवरी में बिक्री कोटा तय किया था, जिसमें मिलें पिछले महीने के स्टॉक और फरवरी के उत्पादन की कुल मात्रा का केवल 17 फीसदी हिस्सा ही बाजार में बेच सकती थीं। इसी तरह फरवरी में उससे पिछले महीने के स्टॉक और मार्च के उत्पादन की कुल मात्रा के केवल 14 फीसदी हिस्से की बाजार में बिक्री की मंजूरी दी गई। 
 
उद्योग से जुड़े एक पुराने उद्यमी ने कहा, 'जब इस कोटा व्यवस्था की जनवरी, 2018 में घोषणा की गई थी, तब उत्पादन 261 लाख टन रहने का अनुमान था। यह भारत की अनुमानित खपत 250 लाख टन से मामूली अधिक था। इस कोटा व्यवस्था से मार्च के दूसरे सप्ताह में समाप्त दो महीनों के भीतर चीनी की कीमतें 10 फीसदी बढ़ गईं। लेकिन इस्मा के 295 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान जारी करने के कुछ दिनों के भीतर ही कीमतों में यह बढ़ोतरी गायब हो गई। हालांकि वर्तमान कीमतों पर चीनी का निर्यात करना फायदेमंद नहीं है। इसलिए सरकार को निर्यात को बढ़ावा देने और अगले सीजन में बचा स्टॉक कम करने के लिए प्रोत्साहनों की घोषणा करनी चाहिए।'
 
उद्योग की संस्था इस्मा का अनुमान है कि चालू सीजन में 15 मार्च, 2018 तक 258.1 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है, जो पिछले साल की इसी अवधि के उत्पादन 175.5 लाख टन से करीब 50 फीसदी अधिक है। चीनी सीजन 2016-17 में भारत का कुल चीनी उत्पादन 203 लाख टन रहा।  हाजिर थोक बाजारों में चीनी के दाम 31.5 से 32 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए थे, लेकिन अब कीमतें गिरकर 28.50 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई हैं। इससे मिलों को प्रत्येक एक किलोग्राम चीनी की बिक्री पर 3 से 3.5 रुपये का नुकसान हो रहा है। हालांकि एमआईईक्यू लागू करने से चीनी मिलें सरकारी प्रोत्साहनों की बदौलत कुछ चीनी का निर्यात कर सकेंगी। थाईलैंड जोर-शोर से एशियाई बाजारों में अपनी चीनी बेच रहा है और पाकिस्तान की सरकार 11 रुपये प्रति किलोग्राम का प्रोत्साहन दे रही है। इससे नतीजतन वैश्विक बाजारों में चीनी की कीमतों में भारी गिरावट आई है। 
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