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जैविक खाद्य निर्यात में तेजी, बाधाएं कई

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली Mar 28, 2018 10:05 PM IST

देश का कुल कृषि निर्यात भले ही 2015-16 से ठहरा हुआ है लेकिन इसकी एक श्रेणी ऐसी है जिसमें दिन दोगुना रात चौगुना बढ़ोतरी हो रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 और 2016-17 के बीच जैविक खाद्य के निर्यात में करीब 25 फीसदी की तेजी आई है और यह 19.76 अरब रुपये से बढ़कर 24.78 अरब रुपये पहुंच गया है। अलबत्ता इस दौरान कृषि क्षेत्र के कुल निर्यात में एक फीसदी से भी कम बढ़ोतरी हुई और यह 1074.31 अरब रुपये से बढ़कर 1084.26 अरब रुपये हो गया।
 
देश के कुल कृषि निर्यात में जैविक खाद्य की हिस्सेदारी 3 फीसदी से भी कम है लेकिन यह पिछले कुछ वर्षों में नियमित रूप से बढ़ा है। सच्चाई यह है कि पिछले एक दशक में जैविक खाद्य निर्यात सालाना 5 अरब रुपये से बढ़कर करीब 25 अरब रुपये पहुंच गया। इस निर्यात में सोयाबीन और कच्चे कपास की करीब आधी हिस्सेदारी है जबकि बाकी हिस्सा मसाले, चाय, दालें, अनाज और मोटा अनाज है।  गुडग़ांव की ऑर्गेनिक कंपनी जस्ट ऑर्गेनिक के सह संस्थापक पंकज अग्रवाल ने कहा कि भारत में जैविक खाद्य का अधिकांश निर्यात अमेरिका, यूरोपीय संघ और कनाडा को होता है। इसमें बहुत संभावनाएं हैं। उनका मानना है कि जब तक विभिन्न एजेंसियों और जैविक उत्पादों के संवद्र्घन के लिए काम करने वाली संस्थाओं के बीच तालमेल नहीं होगा तब तक यह क्षेत्र आगे नहीं बढ़ सकता है। कई एजेंसियों द्वारा सत्यापन जैविक खाद्य क्षेत्र के विकास में बहुत बड़ी बाधा है। 
 
हाल ही में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने एक अधिसूचना में कहा कि अगर उसने किसी उत्पाद को सत्यापित नहीं किया है और उस पर जैविक का ठप्पा नहीं लगा है तो उसे बेचा नहीं जा सकता है। छोटे किसानों और स्वप्रमाणन वाले कुछ जैविक उत्पादों को इसमें छूट दी गई है। इस प्रक्रिया को पीजीएस सत्यापन कहते हैं। जैविक खाद्य को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं ने इस अधिसूचना को नुकसान पहुंचाने वाला कदम बताया है।  इस समस्या के कारण केवल घरेलू बिक्री ही प्रभावित नहीं हो रही है। यहां तक कि निर्यात के लिए भी कारोबारियों और इस क्षेत्र की कंपनियों को कई एजेंसियों और नियमों से जूझना पड़ रहा है। इससे यह पूरी प्रक्रिया जटिल हो जाती है और लागत बढ़ जाती है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनैशनल इकनॉमिक रिलेशंस (इक्रियर) में प्रोफेसर अर्पिता मुखर्जी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में इस बाजार में कई कंपनियों के उभार से जैविक उत्पादों का निर्यात बढ़ रहा है लेकिन अब भी इस क्षेत्र में कई बाधाएं हैं।
 
इनमें कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के पीजीएस या सत्यापन को मान्यता नहीं देना भी शामिल है। एपीडा निर्यात के लिए तीसरे पक्ष के सत्यापन पर जोर देता है जबकि कृषि मंत्रालय पीजीएस सत्यापित उत्पादों को अनुदान सब्सिडी देती है। मुखर्जी ने कहा, 'भारत के जैविक उत्पादों का डेटाबेस बहुत खराब है। निर्यात के लिए यह अहम होता है कि उत्पाद कहां से आया है। लेकिन समस्या यह है कि एपीडा तीसरे पक्ष द्वारा सत्यापन पर जोर देता है जो काफी महंगा है।' इन कारणों से भारत को जैविक निर्यात के बाजार में काफी नुकसान हो रहा है। जस्ट ऑर्गेनिक के अग्रवाल का भी मानना है कि अगर भारत विश्व बाजार में अपनी स्थिति सुधारना चाहता है तो उसे इस क्षेत्र की बाधाओं को जल्द से जल्द दूर करना चाहिए।
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