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सरकार ने 24 रेशम कीट पालन परियोजनाओं को दी मंजूरी

टी ई नरसिम्हन | चेन्नई Mar 30, 2018 09:50 PM IST

भारत में कच्चे रेशम का उत्पादन वर्ष 2017-18 में 11.5 फीसदी बढ़कर 33,840 टन पर पहुंचने की संभावना है जो कि पिछले वित्त वर्ष में 30,348 टन रहा था। उत्पादन को और अधिक बढ़ाने के लिए, सरकार ने दो वृहत्ï श्रेणियों की मंजूरी दी है जिसके तहत 24 रेशम कीट पालन परियोजनाएं आएंगी। इससे साल 2019 के अंत तक लगभग 3,000 टन अतिरिक्त कच्चे रेशम का उत्पादन होने की उम्मीद है।  कपड़ा राज्यमंत्री अजय टम्टा ने राज्य सभा में कहा कि पिछले पांच वर्ष के दौरान रेशम क्षेत्र ने 6.4 फीसदी की अनुमानित चक्रवृद्घि वार्षिक वृद्घि दर (सीएजीआर) हासिल की है। टम्टा ने आगे कहा कि केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में इसे बढ़ावा देने के लिए 'पूर्वोत्तर क्षेत्र वस्त्र संवर्धन योजना' (एनईआरटीपीएस) नाम से एक छत्र परियोजना आधारित रणनीति को मंजूरी दी है।  

 
 योजना के तहत, वस्त्र क्षेत्र की विभिन्न परियोजनाओं में से रेशम कीट पालन पर केंद्रित परियोजनाओं को दो श्रेणियों में मंजूरी दी गई है। ये श्रेणियां हैं- इंटीग्रेटेड सेरीकल्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (आईएसडीपी) और इंटेंसिव बाइवोल्टाइन सेरीकल्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (आईबीएसडीपी)। मंत्री ने कहा कि ये दो परियोजनाएं रेशम कीट पालन से जुड़े सभी क्षेत्रों में समग्र विकास पर लक्षित हैं। इसके तहत रेशम कीट की खेती को विकसित करने से लेकर वस्त्र उत्पादन तक, उत्पादन शृंखला के प्रत्येक स्तर पर मूल्य संवर्धन किया जाएगा।  
 
इन परियोजनाओं का उद्ïदेश्य उत्पादन मूल्य शृंखला में जरूरी बुनियादी ढांचा का निर्माण कर और स्थानीय स्तर पर लोगों को रेशम कीट पालन और इससे जुड़ी गतिविधियों में प्रशिक्षित कर रेशम कीट पालन को एक व्यावहारिक वाणिज्यिक गतिविध के रूप में स्थापित करना है।  केंद्र सरकार ने 24 रेशम कीट पालन परियोजनाओं को मंजूरी दी है जिसमें क्षेत्र के सभी राज्यों में मलबेरी, ईरी और मुगा क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसकी कुल लागत 8.19 अरब रुपये है जिसमें 6.90 अरब रुपये 2014-15 से 2018-19 के बीच लागू करने लागू करने के लिए है। 
 
इन परियोजनाओं से परियोजनाओं अवधि के दौरान 2,285 टन अतिरिक्त कच्चा रेशम और प्रति वर्ष 1,100 टन रेशम के उत्पादन की उम्मीद है। इससे 46,094 परिवारों को जीविका मिलेगी और लगभग 230,000 लोगों के लिए रोजगार का सृजन होगा।  पिछले वित्त वर्ष तक लगभग 85.2 लाख लोग रेशम कीट पालन और रेशम उद्योग से जुड़े थे। केंद्र सरकार ने फरवरी, 2018 तक पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 6.90 अरब रुपये की तय राशि में से 5.49 अरब रुपये जारी कर दिए। टम्टा ने कहा कि शेष 1.40 अरब रुपये 2017-18 की शेष अवधि और 2018-19 के लिए निश्चित की गई है। केंद्र सरकार ने यह पहल आयात पर निर्भरता विशेष कर चीन से, को कम करने और 2022 तक रेशम उत्पादन में आत्म निर्भर बनने की भारत की योजना के मद्ïदेनजर किया है। 2016-17 में भारत ने उच्च गुणवत्ता वाले 3700 टन रेशम चीन से आयात किया था जो 2013-14 में आयातित 7,000 टन से लगभग आधी है। बाइवोल्टाइन श्रेणी जो कि आयात होने वाले गुणवत्तापूर्ण रेशम का हिस्सा भी है, का उत्पादन 2013-14 में 2,559 टनों के मुकाबले 2016-17 में दोगुने से भी अधिक बढ़कर 5,266 टन हो गया।   
 
2017-18 में बाइवोल्टाइन उत्पादन 6,200 टन तक पुंचने की उम्मीद है और एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 तक जब यह एक बार 12,000 टन तक पहुंच जाएगा तो देश में चीन से रेशम आयात करने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। केंद्रीय रेशम बोर्ड का अनुमान है कि 2022 तक कुल कच्चा रेशम उत्पादन 45,000 टन पर पहुंच सकता है। हाल के बजट में घरेलू रेशम कीट पालन को बचाने के लिए आयातित कच्चे रेशम पर 10 फीसदी का आधारभूत सीमा शुल्क लगाया गया था। 
 
निर्यात 
 
भारत से कच्चा रेशम निर्यात 2016-17 में 16.1 फीसदी घटकर 20.93 अरब रुपये का रह गया जो कि पिछले वित्त वर्ष में 24.95 अरब रुपये का रहा था। रेशम निर्यात में प्राकृतिक रेशम धागा, वस्त्र और कृत्रिम सामान, रेडीमेड कपड़े, रेशमी दरी और रेशम अवशेष शामिल हैं। भारतीय प्रतिनिधियों के अनुसार यूरोप और अमेरिका सहित भारत से आयात करने वाले प्रमुख देशों से मांग में कमी आई है। जिन बाजारों में मांग बरकरार है, वहां भारतीय निर्यातक कीमत के स्तर पर चीनी निर्यातकों से मुकाबला नहीं कर सकते।  एक रिपोर्ट में सिल्क एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कोषाध्यक्ष दिलीप अग्रवाल ने कहा, 'हमारा निर्यात साल दर साल घट रहा है। इसकी वजह यह है कि हम कीमत और गुणवत्ता के मामले में चीनी रेशम का मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। हम धीरे-धीरे अपनी प्रतिस्पर्धी क्षमता और प्रमुख बाजारों को खो रहे हैं।'
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