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महंगी भारतीय दालों की वजह से मुक्त निर्यात नीति विफल

अभिषेक वाघमारे | मुंबई Apr 01, 2018 10:16 PM IST

कैसी है तस्वीर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की तुलना में कई देशों की दालें काफी सस्ती, कृषिगत निर्यात नीति का उद्देश्य 2022 तक भारत का कृषि निर्यात दोगुना करना है

वैश्विक बाजार में म्यांमार के मुकाबले भारतीय तुअर दाल की कीमतें दोगुनी हैं
ज्यादा एमएसपी से कीमतें बढ़ेंगी, असरदार अमल न होने से किसानों को मदद नहीं मिलेगी
दाल भारतीय भोजन का मुख्य हिस्सा है और दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता भारत है
दलहन किसानों का ताल्लुक देश के सूखा क्षेत्र से है जहां सिंचाई कम होती है
दलहन किसानों को उचित कीमत मिलना और दालों का निर्यात बढ़ाना साथ-साथ संभव नहीं है
दालों के किसानों की तादाद सबसे ज्यादा है और उन्हें सरकार के समर्थन की जरूरत है ताकि उन्हें उचित आमदनी मिले
उद्योग के सूत्रों का कहना है कि घरेलू व्यापार भविष्य में अहम होगा

एक दशक पुराने प्रतिबंध को पिछले साल दो बार में हटाए जाने के बावजूद भारतीय दालों का निर्यात नहीं बढ़ रहा है। उद्योग का कहना है कि इसकी वजह  वैश्विक बाजार में भारतीय दलहनों की गैर-प्रतिस्पर्धी कीमतें हैं। निर्यातित दालों (मुख्य रूप से छोले) की कीमतें 2013-14 के 0.84 डॉलर प्रति किलोग्राम से बढ़कर 2017-18 में 1.43 डॉलर प्रति किलोग्राम पर पहुंच गईं जो पिछले पांच वर्षों में सर्वाधिक है। वहीं निर्यात की गई दालों की मात्रा भी 2013-14 के 34,600 करोड़ टन से घटकर 2017-18 में (जनवरी तक) 10,900 करोड़ टन रह गई। कीमत के संदर्भ में देखें तो निर्यात में कमजोरी का रुझान दर्ज किया गया है। जहां 2012-13 से 2016-17 तक यह 20 करोड़ डॉलर पर था वहीं नियमों में ढील दिए जाने के बावजूद 2017-18 में जनवरी तक घटकर 15 करोड़ डॉलर रह गया। तुअर दाल, मूंग दाल और उड़द दाल का निर्यात सितंबर 2017 में खोला गया और दिसंबर में इसे पूरी तरह नियंत्रण-मुक्त कर दिया गया। 

इन दालों का निर्यात मजबूत नहीं है, जो कृषिगत निर्यात नीति के हाल में जारी मसौदे के लिहाज से शुभ संकेत नहीं है। कृषिगत निर्यात नीति का उद्देश्य वर्ष 2022 तक भारत का कृषि निर्यात दोगुना करना है। सरकारी खरीद या बाजार के जरिये उचित कीमतों की मांग कर रहे दलहन किसानों को उस स्थिति में नुकसान का सामना करना पड़ेगा जब भारतीय दालें वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी, क्योंकि इससे किसानों को प्राप्त होने वाली कीमतों में कमी लाए जाने की जरूरत होगी।

इंडियन पल्सेज ऐंड ग्रेन्स एसोसिएशन (आईपीजीए) के उपाध्यक्ष बिमल कोठारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'भारत में दालों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) काफी महंगा है। हालांकि वास्तविक रूप से मिलने वाली कीमतें कभी कभी इस एमएसपी से नीचे रहती हैं, लेकिन जब हम इनकी तुलना वैश्विक बाजारों से करें तो पता चलता है कि वे गैर-प्रतिस्पर्धी बनी हुई हैं।'

कच्ची तुअर (साबुत) के मामले में एमएसपी 5,450 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि मंडियों में किसानों द्वारा जारी वास्तविक कीमत 4,000 और 4,500 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में है और कुछ मामलों में तो यह एमएसपी पर (महाराष्ट्र में) है। व्यापारियों का कहना है कि वहीं तुअर (तैयार दाल) की कीमत 65-70 रुपये प्रति किलोग्राम पर है। व्यापारियों और उद्योग संगठन के सूत्रों का कहना है कि इसकी तुलना में, म्यांमार से तुअर दाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में 35 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर उपलब्ध है। 

यही रुझान आस्ट्रेलिया से छोले और कनाडा से पीली तथा हरी मटर के मामले में है। इन देशों से ये दालें भारत की तुलना में काफी सस्ती हैं। मुंबई के दलहन व्यापारी मयूर सोनी ने कहा, 'वैश्विक बाजार में हमारी दालें महंगी हैं। कुछ अफ्रीकी देशों और म्यांमार की तुअर दाल की कुछ किस्में 25 रुपये प्रति किलोग्राम पर भी कारोबार कर रही हैं जिनकी तुलना भारतीय तुअर दाल से करना संभव नहीं है।'

भारत में पिछले दो वर्षों में सभी तरह की दालों की रिकॉर्ड बुआई और उत्पादन दर्ज किया गया। पिछले दो वर्षों में घरेलू दलहन उत्पादन 2.3 करोड़ टन और 2.4 करोड़ टन दर्ज किया गया, जबकि आयात 66 लाख और 56 लाख टन पर पहुंच गया। पिछले दो वर्षों में जहां सालाना दलहन खपत 2.3 करोड़ टन रही है वहीं सालाना उपलब्धता लगभग 3 करोड़ टन, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 1.2 करोड़ टन दाल बगैर बिकी रह गई। 

अधिक आपूर्ति के बाद कीमतें गिरने की आशंका से चिंतित सरकार ने सभी तरह की दालों के निर्यात को शुरू करने में दिलचस्पी दिखाई है। व्यापारियों का कहना है कि इससे न तो किसानों को न ही निर्यातकों को मदद मिली है। एक व्यापारी का कहना है, 'इस नीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है जिससे हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में दो वजहों से बढ़ोतरी होती है। एमएसपी प्रणाली पर प्रभावी तरीके से अमल नहीं हो पाता जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि किसानों की आमदनी में सुधार होगा और वैश्विक बाजार में भारतीय दालों की कीमतों में बढ़ोतरी होगी जिससे निर्यात प्रभावित होता है।'

किसानों सहित औसत भारतीय उपभोक्ताओं के लिए दालें प्रोटीन का अहम स्रोत है। भारतीय किसानों में दलहन की फसल उगाने वाले किसानों की तादाद ज्यादा है जिनकी बेहतर आमदनी के लिए सरकार के समर्थन की जरूरत है। उद्योग संगठन के सूत्रों का कहना है कि भविष्य में देश के भीतर ही व्यापार करना अहम होगा।  कृषि विभाग के अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'खाड़ी, यूरोप और अमेरिका में रहने वाले भारतीय ही नियमित उपभोग के लिए दालों की मांग करते हैं। लेकिन अगर उन्हें दूसरे देशों से सस्ती दालें मिल रही होंगी तब आखिर भारत की महंगी दालें उन तक कैसे पहुंचेंगी?' आईपीजीए के उपाध्यक्ष का कहना है कि म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा पिछले दो दशक तक भारत में निर्यात करते रहे हैं।
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