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थोक में खाद्य तेल निर्यात नहीं फायदेमंद

दिलीप कुमार झा | मुंबई Apr 03, 2018 09:40 PM IST

भारतीय निर्यातकों के लिए आयातित कच्चे और रिफाइंड खाद्य तेल को घरेलू इकाइयों में प्रसंस्कृत कर निर्यात करना फायदेमंद नहीं रहेगा। वे केवल घरेलू स्तर पर उत्पादित तेल की मामूली मात्रा का निर्यात कर पाएंगे। इस तरह खाद्य तेलों के थोक निर्यात को खोलने का भारतीय निर्यातकों को फायदा नहीं मिलने के आसार हैं।  इस समय भारत हर साल करीब 90 लाख टन कच्चे पाम तेल का आयात करता है। यह आयात घरेलू इकाइयों में रिफाइनिंग के लिए होता है। फिर इसे अकेले या किसी अन्य खाद्य तेल में मिलाकर बेचा जाता है। इसके अलावा देश में हर साल करीब 30 लाख टन रिफाइंड खाद्य तेलों का आयात होता है। देश में हर साल 35 लाख टन गैर-खाद्य तेलों का भी आयात होता है। भारत खाद्य तेल की 55 फीसदी मांग आयात से पूरी करता है, जो घरेलू स्तर पर कम तिलहन उत्पादन होने की स्थिति में 60 फीसदी तक पहुंच जाता है। 
 
फॉच्र्यून ब्रांड के खाद्य तेलों की उत्पादक अदाणी विल्मर के मुख्य कार्याधिकारी अतुल चतुर्वेदी ने कहा, 'हम आयात पर निर्भर देश हैं, इसलिए खाद्य तेल का थोक निर्यात संभव नहीं होगा। केवल कुछ मौकों पर मूंगफली के तेल का मामूली मात्रा में निर्यात हो सकता है। आयातित खाद्य तेल का निर्यात करना फायदे का सौदा नहीं होगा।' भारत का सालाना वनस्पति (खाद्य एवं गैर-खाद्य) तेल आयात 155 टन के आसपास रहता है। घरेलू स्तर पर उगाए जाने वाले सोयाबीन, सरसों और तिल जैसे तिलहनों से 65 से 90 लाख टन खाद्य तेलों का उत्पादन होता है, जिसमें से मामूली मात्रा का इस्तेमाल दवाओं में भी होता है। भारत में खाद्य तेल की कुल खपत करीब 250 लाख टन होने का अनुमान है। सरकार ने पिछले सप्ताह देश से खाद्य तेलों के थोक निर्यात पर दशकों से लगा प्रतिबंध हटाया है। हालांकि सरसों के तेल पर रोक बरकरार रखी गई है। इससे पहले सरकार 5 किलोग्राम तक के छोटे पैक में हर साल 10,000 टन खाद्य तेलों के निर्यात को मंजूरी दे रही थी। 
 
भारतीय तिलहन एवं उपज निर्यात संवर्धन परिषद (आईओपीईपीसी) के चेयरमैन संजय शाह ने कहा, 'लंबे समय से यह मांग की जा रही थी। इससे तिलहन का उत्पादन करने वाले भारतीय किसानों को मदद मिलेगी और देश से खाद्य तेलों का ज्यादा निर्यात होगा। हमें उम्मीद है कि इस फैसले से खाद्य तेल निर्यातक वृद्धि कर पाएंगे। घरेलू स्तर पर उत्पादित खाद्य तेलों का निर्यात बढऩे से तेल निकालने वाली इकाइयां ज्यादा क्षमता पर चलेंगी और किसानों को अपनी तिलहन उपज के बेहतर दाम मिलेंगे।'
 
आईओपीईपीसी के आंकड़े दर्शाते हैं कि वित्त वर्ष 2016-17 में 29,000 टन खाद्य तेलों का निर्यात हुआ, जिनकी कीमत 3.39 अरब रुपये थी। वहीं इससे पिछले वित्त वर्ष में भारत से 23,453 टन खाद्य तेलों का निर्यात हुआ, जिनकी कीमत 2.72 अरब रुपये थी।  हालांकि अब खाद्य तेलों के थोक निर्यात को खोल दिया गया है, लेकिन सरकार भविष्य में न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) के जरिये खाद्य तेलों के निर्यात पर अंकुश भी लगा सकती है। हाल में कुछ जिंसों की किल्लत के कारण उन पर एमईपी लगाया गया है। आईओपीईपीसी के मुख्य कार्याधिकारी सुरेश रामरखियानी ने कहा, '5 किलोग्राम की पैकिंग की अनिवार्यता से निर्यातकों और आयातकों की लागत बढ़ जाती है। इन पैकेटों को फिर से खोलने की अतिरिक्त लागत से आयातकों के लिए तेल आयात करना अलाभकारी बन जाता है। आयातक थोक पैकिंग को तरजीह देते हैं क्योंकि विभिन्न आयातक देशों में उपभोक्ता आदतें, आगे और प्रसंस्करण, मिश्रण और लेबल कानून अलग-अलग हैं। इससे अलग-अलग पैकेज आकारों की जरूरत होती है। इस कदम से भारतीय निर्यातकों  को समान अवसर मुहैया कराए गए हैं क्योंकि अन्य प्रतिस्पर्धी देशों में थोक पैकेजिंग पर कोई प्रतिबंध नहीं है।'
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