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किसानों को एमएसपी देने में खर्च होंगे 25,000 करोड़ रुपये

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली Apr 04, 2018 09:51 PM IST

... ताकि किसानों को मिले लाभ

केंद्र सरकार एमएसपी पर खरीद के लिए कर रही है 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये खर्च करने पर विचार, इस बारे में जल्द हो सकता है फैसला
खरीद के लिए राज्य अपना सकते हैं अन्य तरीके

केंद्र सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ सुनिश्चित करने के लिए राज्यों के साथ मिलकर शुरुआती तौर पर कम से कम 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये खर्च करने पर विचार कर रही है। यह व्यय माल की सीधी खरीद पर या मध्य प्रदेश की भावांतर भुगतान योजना की तर्ज पर हो सकता है। अधिकारियों ने कहा कि विस्तृत कैबिनेट प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसमें राज्यों व केंद्र सरकार की व्यय में हिस्सेदारी का ब्योरा है, लेकिन एक चीज साफ दिख रही है कि सरकार कोई एक खरीद मॉडल नहीं अपनाएगी और यह राज्यों पर निर्भर रहेगा कि वे मार्केट एश्योरेंस योजना (एमएएस) के तहत सीधी खरीद करते हैं, भावांतर भुगतान (पीडीपीएस) करते हैं या सरकार की ओर से निजी एजेंसियों से खरीद कराते हैं।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'शुरुआत में वित्तीय बोझ 11,000 से 12,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन राज्योंं सहित विभिन्न हिस्सेदारों के साथ विस्तार से चर्चा के बाद इतनी राशि को अपर्याप्त पाया गया। स्थिति जो भी हो, इस कार्यक्रम को लागू करने में वित्तीय संकट कभी नहीं आने दिया जाएगा क्योंकि यह अब सरकार की घोषित नीति है, जिसके बारे मेंं 2018-19 के बजट में कहा गया है।' उन्होंने कहा कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों की उच्चाधिकार समिति का गठन किया गया है, जिसमें कृषि, खाद्य आदि सहित सभी बड़े मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल हैं और विभिन्न विकल्पोंं पर विचार किया जा रहा है। 

अधिकारी ने कहा, 'हालांकि बजट में इस योजना को लेकर कोई खास प्रावधान नहीं किया गया है, जिससे कि किसानों को एमएसपी का अधिकतम लाभ मिल सके, लेकिन इस साल बाद में पूरक मांग के माध्यम से वित्त की व्यवस्था कर ली जाएगी।'  नीति आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था के तहत कृषि उत्पादों की खरीद के तीन मॉडल सुझाए हैं, लेकिन केंद्र सरकार देश भर में एक व्यवस्था लागू करने को इच्छुक नहीं है और यह राज्यों पर छोड़ा जा सकता है कि वे तीन विकल्पों में से क्या चुनते हैं।

दरअसल आयोग द्वारा कुछ सप्ताह पहले जारी अवधारणा नोट में भी ऐसा देखा गया था कि उसमें सभी राज्यों के लिए एक मॉडल का पक्ष नहीं लिया गया था और यह बात की गई थी कि राज्य एक या एक से अधिक मॉडल अपना सकते हैं जिससे किसानों को बढ़े न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिल सके। 

अवधारणा नोट के मुताबिक सीधे खरीद के मॉडल, जिसे मॉर्केट एश्योरेंस योजना (एमएएस) का नाम दिया गया है, में अगर राज्यों को निर्धारित एमएसपी से 25 प्रतिशत तक घाटा होता है तो केंद्र सरकार 100 प्रतिशत भरपाई करेगी। अगर फसल के मूल्य व एमएसपी के बीच अंतर 25-30 प्रतिशत है तो इस अंतर की भरपाई केंद्र व राज्य  60:40 के अनुपात में करेंगे। वहीं अगर खरीद घाटा 30-40 प्रतिशत है तो केंद्र व राज्य इस घाटे की 50:50 प्रतिशत भरपाई करेंगे। अगर मूल्य में अंतर 15 प्रतिशत तक रहता है तो कुल खर्च करीब 40,331 करोड़ रुपये और अगर यह अंतर 25 प्रतिशत तक रहता है तो खर्च करीब 53,775 करोड़ रुपये आ सकता है।

यह कल्पना की गई है कि गेहूं और चावल इस खरीद व्यवस्था के तहत नहीं आएगे और करीब कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत अतिरिक्त के रूप में बाजार मेंं बेचा जाएगा। वहीं अगर मध्य प्रदेश में लागू भावांतर योजना को अपनाया जाता है तो एमएसपी और खरीद मूल्य में 15 प्रतिशत का अंतर होने पर 22,584 करोड़ रुपये का घाटा होगा और अगर अंतर 25 प्रतिशत तक होगा तो खजाने पर 36,300 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। इसमेंं भी गेहूं व चावल खरीद को बाहर रखा गया है।  वहीं निजी खरीद मॉडल में स्वतंत्र खरीदारोंं का चयन सरकारी मशीनरी करेगी और यह पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से होगा। इस पर भी राज्यों के साथ चर्चा हुई है। 

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