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एमएसपी वृद्धि के फेर में फंसेगी महंगाई!

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली Apr 15, 2018 09:51 PM IST

सरकार एक ऐसी व्यवस्था कायम करने की दिशा में काम कर रही है, जिससे ज्यादा से ज्यादा किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी का फायदा मिल सके। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि सरकार के एमएसपी में गारंटीशुदा बढ़ोतरी से खाद्य महंगाई पर कितना असर पड़ेगा और यह किन फसलों पर पड़ेगा।  सरकार के मुख्य थिंक-टैंक नीति आयोग से लेकर उद्योग के दिग्गजों और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) तक ने इस बात पर चिंता जताई है कि 2018-19 की बजट घोषणा की तर्ज पर एमएसपी में भारी बढ़ोतरी से महंगाई में बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है। अगर महंगाई तत्काल नहीं बढ़ी तो यह अगले 6 से 8 महीनों में जरूर बढ़ेगी। 
 
हालांकि कुछ की राय इससे उलट है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के ए2 और एफएल लागत के योग से 50 फीसदी अधिक एमएसपी की गारंटी देने से सभी जिंसों की महंगाई पर एकसमान असर नहीं पड़ेगा। यह असर थोड़े समय रहेगा और अलग-अलग जिंसों में अलग-अलग रहेगा। ए2 लागत में बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, सिंचाई आदि पर होने वाले खर्च शामिल होते हैं, जबकि एफएल परिवार के लोगों के श्रम की अनुमानित लागत है।  सरकार इस समस्या का समाधान घरेलू उत्पादन या ज्यादा आयात के जरिये आपूर्ति बढ़ाकर कर सकती है। इसका एक उदाहरण मक्का है। मक्का का एमएसपी खरीफ सीजन 2017-18 के लिए 1,425 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि इसकी ए2 एवं एफएल लागत 1,044 रुपये प्रति क्विंटल है। इसका मतलब है कि उत्पादन की ए2 और एफएल लागत पर करीब 36.49  फीसदी औसत प्रतिफल मिलेगा। लागत पर 50 फीसदी मुनाफे का सरकारी वादा पूरा करने के लिए आगामी खरीफ सीजन (2018-19) में मक्के के एमएसपी में कम से कम 14.5 फीसदी बढ़ोतरी करनी होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे घरेलू बाजार में मक्के की कीमतें बढ़ जाएंगी। 
 
लेकिन इसके विपरीत नजरिया यह है कि भारत में बहुत सी फसलों की कीमतें एमएसपी से अधिक हैं। हालांकि 2016 इसका अपवाद रहा है। जब एमएसपी व्यवस्था से बाहर ज्यादा कीमतें मिलेंगी तो कोई व्यक्ति एमएसपी को लेकर क्यों फिक्र करेगा?   हाल में नीति आयोग के एक पत्र में खरीद के मॉडलों को लेकर सुझाव दिया गया है। इसने बेहतर बाजारों और कीमतों में बढ़ोतरी रोकने के लिए उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच खाई कम करने की वकालत की है।  आंकड़े दर्शाते हैं कि केंद्र सरकार को किसानों को गारंटीशुदा लाभ देने का वादा पूरा करना चाहती है तो एमएसपी घोषित की जाने वाली 23 प्रमुख फसलों में सेकरीब 13 फसलों का एमएसपी आगामी खरीफ  सीजन से बढ़ाना होगा। रागी, ज्वार, सूरजमुखी और नाइजर सीड के एमएसपी में सबसे ज्यादा (30 फीसदी से अधिक) बढ़ोतरी होगी।
 
रागी का वर्तमान एमएसपी करीब 1,900 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि इसकी ए2 एवं एफएल लागत 1,861 रुपये प्रति क्विंटल अनुमानित है। इससे इसकी लागत पर महज 2.10 फीसदी प्रतिफल मिलता है। इसका मतलब है कि सरकार को 2018-19 की बजट घोषणा का वादा पूरा करने के लिए इसका एमएसपी 48 फीसदी बढ़ाना होगा। हालांकि यह देखना होगा कि इससे स्थानीय बाजार में रागी की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होती है।  अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) के दक्षिण-एशिया के निदेशक पीके जोशी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'मुझे नहीं लगता कि एमएसपी में बढ़ोतरी से सभी जिंसों की कीमतों में एकसमान बढ़ोतरी होगी। यह बढ़ोतरी हर फसल में अलग-अलग होगी। गेहूं और चावल के मामले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली महंगाई को कम करने में मददगार होगी, जबकि अन्य जिंसों में आयात एक विकल्प हो सकता है। यह आगे देखना होगा।' उन्होंने कहा कि उनके (आईएफपीआरआई) के अनुभवाश्रित साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि दलहनों में एमएसपी बढ़ाए जाने से हमेशा महंगाई नहीं बढ़ती है। 
 
केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि अगर एमएसपी ए2 एवं एफएल लागत से 50 फीसदी अधिक तय किया जाता है तो इसका महंगाई में एकसमान बड़ी बढ़ोतरी नहीं होगी क्योंकि बहुत सी जिंसों की बाजार कीमतें ऊंची बनी हुई हैं।  हालांकि पूर्व कृषि सचिव शिराज हुसैन का मत इससे उलटा है। हुसैन ने कहा, 'अगर एमएसपी में बढ़ोतरी से महंगाई तत्काल भी नहीं बढ़ी तो अगले 6 से 8 महीनों में जरूर बढ़ेगी।' उन्होंने कहा कि कपास जैसी फसलों में बाजार समीकरणों को मद्देनजर रखे बिना एमएसपी में मनमानी बढ़ोतरी से अंतरराष्ट्रीय मांग कम हो जाएगी। 
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