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बाजार हिस्सा घटने से चिंतित छोटे सराफ

टी ई नरसिम्हन | चेन्‍नई Apr 17, 2018 08:39 PM IST

समान अवसर न मिलने से देश के छोटे खुदरा आभूषण विक्रेता और विनिर्माता पर दबाव है। उनका आरोप है कि सरकार बड़े खुदरा विक्रेताओं को प्रोत्साहन दे रही है। छोटे सराफों का कहना है कि बड़ी आभूषण शृंखलाओं को ग्राहकों से जमा और अन्य प्रोत्साहनों के अलावा कम ब्याज दरों पर स्वर्ण धातु ऋण मिल रहा है। लेकिन संगठित खुदरा विक्रेताओं का कहना है कि छोटे सराफ कुशल नहीं हैं, इसलिए वे प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं।

विश्व स्वर्ण परिषद का अनुमान है कि भारत में 3,85,000 से 4,10,000 सराफ हैं। वर्ष 2000 से 2015 के बीच संगठित सराफों की बाजार हिस्सेदारी 5 फीसदी से बढ़कर 23 फीसदी पर पहुंच गई है और यह 2020 तक 35 से 40 फीसदी पर पहुंचने के आसार हैं। परिषद का कहना है कि इसकी वजह शहरी आबादी में बढ़ोतरी और युवा ग्राहकों के बीच ब्रांडेड आभूषणों को लेकर बढ़ती जागरूकता है। लेकिन छोटे सराफों का आरोप है कि बड़े खुदरा विक्रेताओं की वजह से उन्हें मार्जिन में भारी कमी करने को मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनके कारोबार पर असर पड़ रहा है।

इंडियन बुलियन ऐंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के मुताबिक छोटे खुदरा सराफों के वजूद पर बड़ा जोखिम पैदा हो गया है क्योंकि करीब 25 फीसदी खुदरा कारोबार बड़ी शृंखलाओं के पास आ गया है। आईबीजेए की कौशल विकास परिषद के अध्यक्ष नीलेश गुप्ता ने कहा, 'बड़े और छोटे विनिर्माताओं को मिलने वाले अवसरों में बहुत ज्यादा अंतर है क्योंकि बड़े सराफों को मामूली ब्याज दरों पर स्वर्ण धातु ऋण मिल जाता है। 'उन्होंने कहा, 'अगर आगे यही रुझान बना रहा तो हमें यह काम छोड़कर अन्य कोई काम तलाशने को मजबूर होना पड़ सकता है।'

बड़े खुदरा विक्रेता बाजार को बिगाड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें बैंकों से 3.35 फीसदी ब्याज दर पर स्वर्ण धातु ऋण मिल रहा है। बैंक छोटे सराफों को स्वर्ण धातु ऋण नहीं मुहैया कराना चाहते हैं, इसलिए उन्हें निजी सहित अन्य तरह के ऋण लेने पड़ते हैं, जिनकी ब्याज दर करीब 12 से 14 फीसदी है।

बड़े खुदरा विक्रेता ग्राहकों से स्वर्ण और रुपया जमाएं स्वीकार करने में सक्षम हैं। ऐसे ज्यादातर सराफ इन जमाओं को ग्राहकों से अग्रिम के रूप में दिखाते हैं, भले ही जमा की अवधि 11 महीने हो। इससे वे विनिर्माताओं से खरीद में प्रतिस्पर्धा कर पाते हैं और तगड़ी सौदेबाजी कर पाते हैं क्योंकि विनिर्माताओं के पास उनकी शर्तों को स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है। इससे विनिर्माताओं के मार्जिन पर दबाव पड़ता है, जो 3 से 3.5 फीसदी से घटकर आधा फीसदी रह गया है।

आईबीजेए के सचिव सुरेंद्र मेहता ने कहा, 'इस समय यह बाजार में गंभीर मुद्दा है। विनिर्माताओं मार्जिन और भुगतान शर्तों पर कमजोर पड़ रहे हैं। इस प्रक्रिया से बहुत से सराफों के बैंक खाते पर दबाव आएगा।' उन्होंने कहा, 'छोटे सराफों के लिए नियमों को उदार बनाकर छोटे सराफों को स्वर्ण धातु ऋण मुहैया कराने की जरूरत है। इसके अलावा सराफों की स्वर्ण और रुपया जमा योजना को भी देखने की जरूरत है क्योंकि उन्हें बिक्री के लिए ली गई अग्रिम राशि नहीं कहा जा सकता है।' बैंकों से कर्ज लेना भी मुश्किल होता जा रहा है।

मुंबई ज्वैलर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष कुमार जैन ने कहा, 'बड़े खुदरा विक्रेताओं के पास बड़े शोरूम हैं, वे विज्ञापन दे सकते हैं और उन्हें सरकार से बहुत से लाभ मिलते हैं। लेकिन ये छोटे सराफों को नहीं मिलते हैं। छोटे खुदरा विक्रेताओं को बाहर से कोई मदद नहीं मिल रही है। हाल में आभूषण घोटाले के बाद बैंक लेटर ऑफ क्रेडिट के लिए 120 से 150 फीसदी गिरवी की मांग कर रहे हैं।'

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