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एमएसपी से खाद्यान्न खरीद महंगी नहीं!

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली Apr 19, 2018 09:56 PM IST

केंद्र ने प्रस्तावित नई न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रक्रिया के तहत कृषि जिंसों की खरीद संबंधी लागत बढऩे की आशंकाओं को शांत कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि यह प्रक्रिया 1.2-1.5 करोड़ टन खाद्य फसलों की खरीद के लिए लागू की जा सकती है, खासतौर पर दलहन और मोटे अनाज के लिए। शेष फसलें जिनके लिए सरकार ने एमएसपी की घोषणा की है, वे या तो चावल और गेहूं की तरह मौजूदा खरीद प्रक्रिया के अंतर्गत आएंगी या फिर तिलहन और मक्के की तरह, जिनके दाम 2017 जैसे कुछेक वर्षों को छोड़कर परंपरागत रूप से एमएसपी से अधिक रहे हैं। 
 
केंद्र ने लगभग 23 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है जिनमें अनाज, दलहन, तिलहन और मोटे अनाज शामिल हैं। ये सब मिलकर सालाना करीब 30 करोड़ टन बैठते हैं। इनमें चावल और गेहूं की प्रमुखता रहती है जो एक साथ मिलकर 21 करोड़ टन या लगभग 70 प्रतिशत रहते हैं। चावल और गेहूं की खरीद भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के तहत ही जारी रहेगी। शेष नौ करोड़ टन में से 5.8 करोड़ टन मक्का और तिलहन हैं। अधिकारियों ने कहा कि 2016 और 2017 जैसे कुछेक वर्षों को छोड़कर, ऐतिहासिक रूप में मक्का और तिलहन के दाम एमएसपी से अधिक रहे हैं। इनके दामों को वैश्विक बाजार के आधार पर नियमित किया जाता है, जिन्हें शुल्क नीति द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। बाकी चार करोड़ टन के मोटे अनाज और दलहन के दामों में अधिक अस्थिरता रहती है। इनके दाम एमएसपी से नीचे रहे हैं।
 
इस चार करोड़ में से 30 प्रतिशत उत्पादन के लिए मध्यप्रदेश की भावांतर योजना की तर्ज पर 'मूल्य ह्रïास भुगतान योजना' (पीडीपीएस) का प्रस्तावित खरीद मॉडल या मार्केट एश्योरेंस स्कीम (एमएएस) नामक प्रत्यक्ष खरीद योजना का इस्तेमाल किया जाएगा। दूसरे शब्दों में, अगर रबी और खरीफ के दो सीजनों के 1.2-1.4 करोड़ टन कृषि जिंसों के दाम एमएसपी से नीचे गिरते हैं, तो पीडीपीएस या एमएएस लागू होगी। एक अधिकारी ने कहा कि सुनिश्चित एमएसपी मॉडल के जरिये सरकार कृषि विपणन के राष्ट्रीयकरण पर विचार नहीं कर रही है, बल्कि वह तो किसानों के लिए केवल सुरक्षित तंत्र उपलब्ध करवा रही है और इसमें गेहूं तथा चावल को शामिल नहीं करेगी। इसके लिए पहले से ही एक निर्धारित खरीद प्रक्रिया है जिसका परिचालन एफसीआई द्वारा किया जाता है।
 
अधिकारियों ने कहा कि सरकार खरीद कार्यक्रम के संबंध में जल्दबाजी नहीं करेगी, क्योंकि इसके लिए बहुत-सी तैयारी और राज्यों के साथ सलाह-मशविरा करना होगी और इस वजह से इसे क्रियान्वित करने में समय लग सकता है। इस प्रकार की बड़ी योजना के लिए वित्तीय प्रभाव समेत सभी प्रकार की चीजों पर सावधानी से ध्यान देने के बाद ही कोई औपचारिक घोषणा की जाएगी।
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