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मंडी के बाहर फसल बेचने की अनुमति मिले

राजेश भयानी | मुंबई Apr 23, 2018 10:03 PM IST

जिंस हाजिर और डेरिवेटिव बाजार को जोडऩे के लिए गठित एक समिति ने देश के किसानों को मंडियों से बाहर अपनी उपज बेचने की अनुमति देने की सिफारिश की है ताकि उन्हें बाजार में अच्छी से अच्छी कीमत मिल सके। समिति का कहना है कि अगर मंडी परिसर से बाहर फसल की बिक्री की जाती है तो इस पर फीस या शुल्क में छूट दी जानी चाहिए। नीति आयोग के सदस्य (कृषि) रमेश चंद की अगुआई में गठित समिति ने ये सुझाव दिए हैं। चूंकि हाजिर और डेरिवेटिव के बीच तारतम्य के लिए डेरिवेटिव प्लेटफॉर्म पर हाजिर बाजार के जोखिम की हेजिंग में सुधार करने की जरूरत है, इसलिए समिति ने सिफारिश की है कि डेरिवेटिव बाजारों में कारोबार की लागत को भी व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए। अलबत्ता समिति ने इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि एक्सचेंज लेनदेन शुल्क में कमी करेगा या फिर सरकार शुल्कों में कटौती करेगी। जिंस लेनदेन कर, स्टांप शुल्क, सेवा कर, सेबी शुल्क आदि से कारोबार की लागत में बढ़ोतरी होती है।
 
एक साल पहले वित्त मंत्रालय ने इस समिति का गठन किया था। यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि की 16 फीसदी हिस्सेदारी है और देश का करीब आधा श्रमबल कृषि कार्यों में लगा है। उपज को मंडियों से बाहर बेचने की अनुमति देने से जिंसों के खरीदारों खासकर बड़ी प्रसंस्करण कंपनियों को सीधे किसानों से उपज खरीदने का विकल्प मिलेगा। यह दोनों के लिए अच्छी स्थिति है। समिति का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक हाजिर बाजारों और हाजिर बाजारों जैसे विनियमित इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्मों को बाजार माना जा सकता है ताकि उत्पादक/किसान अपनी उपज सीधे तौर पर बेच सकें और इसके लिए उन्हें मंडी को कोई शुल्क न देना पड़े। समिति चाहती है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय और विभिन्न राज्य सरकारें इन बदलावों को आगे बढ़ाएं। समिति के मुताबिक सभी राज्यों में आदर्श कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) कानून को लागू करने की जरूरत है। इस कानून में नए आदर्श कृषि उपज एवं पशुपालन विपणन (संवद्र्घन) 2017 के मुताबिक बदलाव से कृषि बाजारों के कामकाज में सुधार होगा और उत्पादक तथा उपभोक्ता के बीच सीधा संपर्क बनेगा। इन सभी सुझावों का मकसद हाजिर और वायदा जिंस बाजारों को आपस में मिलाना है। समिति की रिपोर्ट में कृषि और गैर कृषि जिंसों को शामिल किया गया है।
 
समिति ने अपनी रिपोर्ट करीब दो महीने पहले सौंपी थी और आर्थिक मामलों का विभाग इसका अध्ययन कर रहा था। अब इस सुझावों को सार्वजनिक किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटे किसानों को मोलभाव में मदद करने के लिए कृषि उत्पादक संगठनों और सहकारी संगठनों को बढ़ावा देने की जरूरत है। वे हाजिर बाजारों में सामूहिक मोलभाव कर सकते हैं और डेरिवेटिव प्लेटफॉर्म पर हेज तथा आपूर्ति के लिए उपज का आकार बढ़ा सकते हैं। समिति ने साथ ही सुझाव दिया है कि जब सरकार भंडारण सीमा लगाती है तो उसे किसान संगठनों द्वारा गोदामों में किए गए भंडारण पर शुल्क में छूट देनी चाहिए। 
 
समिति ने सुझाव दिया है कि किसानों को वैज्ञानिक तरीके से भंडारण और फसलों के बारे में गुणवत्ता जानकारी देने, कम लागत वाली कृषि का विस्तार, तकनीक आधारित जांच जैसी सुविधाओं को सुधारने के लिए निजी उद्यमियों को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। साथ ही उत्पादकों/किसानों के लिए हाजिर और डेरिवेटिव बाजार में सुगमतापूर्वक लेनदेन सुनिश्चित करने के लिए सभी गोदामों का एक ही एकीकृत प्राधिकरण के पास पंजीकरण किया जाएगा। हालांकि समिति ने यह साफ नहीं किया है कि क्या गैर कृषि उत्पादों खासकर महंगी जिंसों के लिए यह प्राधिकरण वेयरहाउस विकास एवं नियामक प्राधिकरण (डब्ल्यूडीआरए) हो सकता है या नहीं। समिति का कहना है कि एक विनियमित भंडारण ढांचे की जरूरत है और इसमें उतरने के लिए डब्ल्यूडीआरए स्वाभाविक लाभ की स्थिति में है। साथ ही विभिन्न धातुओं के मामले में बेहतर आपूर्ति नियम बनाने की जरूरत है ताकि बाजार में इन वस्तुओं के कारोबार का और मानकीकरण किया जा सके। गैर कृषि श्रेणी में धातुओं जैसी जिंसों के लिए केंद्रीय इस्पात मंत्रालय को सभी लौह और अलौह धातुओं के बाजारों की निगरानी का काम सौंपा जा सकता है।
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