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जूट उद्योग को अधिक राहत नहीं

जयजित दास | भुवनेश्वर Apr 26, 2018 10:01 PM IST

कच्चे जूट के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में इजाफे के बावजूद जूट उद्योग के लिए उत्साहित होने की कोई वजह नहीं नजर आती। हां इससे जूट किसानों को थोड़ा बहुत आर्थिक लाभ अवश्य मिल सकता है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने कच्चे जूट का एमएसपी 35,000 रुपये प्रति टन से बढ़ाकर 37,000 रुपये प्रति टन करने को कल मंजूरी दे दी। संशोधित एमएसपी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की अनुशंसाओं के अनुरूप ही है। आयोग एमएसपी की अनुशंसा करते समय उत्पादन लागत, कुल मांग और आपूर्ति, घरेलू और अंतरराष्टï्रीय मूल्य, अंतरफसलीय क्षेत्रों, कृषि और गैर कृषि क्षेत्र की कारोबारी शर्त तथा शेष अर्थव्यवस्था पर एमएसपी के संभावित असर को ध्यान में रखता है। 

 
सरकार को लगता है कि एमएसपी बढ़ाने से जूट उद्योग को मदद मिलेगी। यह उद्योग 40 लाख परिवारों की मदद करता है और करीब 3.7 लाख लोगों को मिलों और अन्य संबद्घ क्षेत्रों में प्रत्यक्ष रोजगार मुहैया कराता है। ये किसान परिवार मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में केंद्रित हैं जो जूट के रकबे और उत्पादन के 95 फीसदी के लिए जिम्मेदार है।  बहरहाल जूट उद्योग के समक्ष और भी कई मसले हैं जिनमें कच्चे जूट की कमजोर बाजार कीमत और खेती के रकबे में आ रही कमी प्रमुख हैं। उद्योग जगत के एक सूत्र के मुताबिक गत वित्त वर्ष में अधिकांश वक्त कच्चे जूट की बाजार कीमत एमएसपी के नीचे रही। बाद में कीमत कुछ बढ़ी। दूसरी चिंता यह है कि कच्चे जूट के उत्पादन का रकबा और मात्रा दोनों घट रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जूट उत्पादन का रकबा 2012-13 के 756,000 हेक्टेयर से घटकर 684,300 हेक्टेयर रह गया है। समान अवधि में जूट का उत्पादन 1.1 करोड़ गांठों से घटकर 98.3 लाख गांठ रह गया। एक गांठ करीब 180 किलो की होती है। 
 
जूट का उत्पादन पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में सीमित है। क्षेत्रवार दृष्टिï से देखें तो पश्चिम बंगाल में 2016-17 में कुल जूट का 76 फीसदी, बिहार में 13 फीसदी और असम में 11 फीसदी उत्पादित हुआ। उत्पादन के मामले में भी पश्चिम बंगाल 78 फीसदी के साथ अव्वल है। बिहार में 14 फीसदी और असम में 8 फीसदी जूट का उत्पादन हुआ।  कच्चा जूट उन जिंस में शामिल है जो थोक मूल्य सूचकांक के तहत आते हैं। 2011-12 को आधार वर्ष मानें तो इसकी भारिता 0.545 है। कच्चे जूट के एमएसपी में बढ़ोतरी के वित्तीय निहितार्थ उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं और कच्चे जूट की खरीद बाजार मूल्य पर निर्भर होगी। 
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