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उद्योग को जीर्णोद्धार की दरकार

टीई नरसिम्हन | चेन्नई May 06, 2018 10:02 PM IST

केरल में काजू प्रसंस्करण उद्योग बंद होने से बचने के लिए अपनी परंपरागत फैक्ट्रियों के जीर्णोद्धार और पुनरुद्धार के लिए केंद्र और राज्य सरकार से सहायता की आस लगाए हुए है। दस साल पहले इस उद्योग का देश के उत्पादन में तकरीबन 85 प्रतिशत योगदान था। राज्य में 865 से अधिक फैक्ट्रियों में से लगभग 90 प्रतिशत बंद हो चुकी हैं और कुल 3,00,000 श्रमिकों में से करीब 2,500,000 बेरोजगार हैं, क्योंकि अधिकतर फैक्ट्रियां कर्ज के जाल में फंसकर गैर निष्पादित संपत्तियां (एनपीए) बन चुकी हैं।

 
संकटग्रस्त उद्योग को बचाने के लिए भारतीय काजू निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसीआई) लघु, मध्यम और दीर्घकालिक पुनरुद्धार पैकेज लेकर आई है। सीईपीसीआई के चेयरमैन आरके भूदेस ने कहा कि 2014 में राज्य सरकार ने 35 प्रतिशत की भारी-भरकम वेतन वृद्धि का  फैसला किया था। इससे 80 किलोग्राम वाले बोरे की उत्पादन लागत 3,200 से 3,400 रुपये बढ़ गई, जबकि वियतनाम में यह 700 रुपये प्रति बोरा है। परिषद का कहना है कि बैंक, केंद्र सरकार और राज्य सरकार उद्योग के लिए मददगार हैं। उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनों के साथ भी कुछ स्पष्टï तालमेल होना चाहिए। 
 
अन्य राज्यों के मुकाबले केरल में उत्पादन लागत बहुत ऊंची है। राज्य में 80 किलोग्राम के बोरे के लिए प्रसंस्करण लागत लगभग  3,200 से 3,400 रुपये आती है जबकि अन्य राज्यों में यह 1,000 से 1,800 रुपये प्रति बोरा है। कुछ साल पहले की गई वेतन वृद्धि उद्योग के सदस्यों की क्षमता से बाहर की बात हो गई थी। अन्य राज्यों में यह वेतन वृद्धि उनकी क्षमता के अनुरूप थी। अन्य राज्यों में उद्योग मशीनीकरण और स्वचालन प्रक्रियाओं के जरिए उत्पादकता में सुधार करने में सक्षम रहा, जबकि केरल में इसे भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। अन्य राज्यों में उत्पादकता दो से तीन गुना तक हो गई। भूदेस ने कहा कि हमने एक मसौदा तैयार किया है जिसके तहत उत्पादकता दोगुनी हो जाएगी। इससे उत्पादन की लागत गिरकर प्रति बोरा तकरीबन 1,850 रुपये हो जाएगी, जबकि अभी यह प्रति बोरा 3,400 रुपये है।
 
उनके अनुसार विभिन्न कंपनियां पहले ही अपना परिचालन बंद कर चुकी हैं, पुनरुद्धार पैकेज के क्रियान्वयन के लिए कार्यशील पूंजी को सावधि ऋण या ईएमआई के रूप में परिवर्तित किया जाना चाहिए। नई कार्यशील पूंजी की भी आवश्यकता है। उद्योग को कुछ मशीनीकरण और स्वचालन प्रक्रियाओं की दिशा में बढऩा चाहिए। इसके लिए कुछ निवेश की जरूरत है। नुकसान न हो, इसके लिए मध्य से दीर्घ अवधि में ऋण प्रबंधन की लागत 1,300 रुपये के स्तर तक घटानी होगी। अल्प अवधि के लिए उद्योग को चमड़ा और कपड़ा क्षेत्र को प्रदान की गई मदद की ही तरह राज्यों, केंद्र और बैंकों से सहायता की अपेक्षा है। परिषद ने राज्य सरकार से श्रमिकों के लिए ईएसआई और भविष्य निधि के भुगतान के जरिये सहायता का अनुरोध किया है।
कीवर्ड Cashew, keral,

  
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