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'गैर-खाद्य के लिए अपनाएं जीएम'

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली May 11, 2018 09:48 PM IST

जेनेटिक इंजीनियरिंग भविष्य की फसलें विकसित करने का एक 'शक्तिशाली' औजार है। लेकिन इसे अभी केवल गैर-खाद्य फसलों में ही अपनाया जा सकता है। खाद्य फसलों में इसे अपनाने से पहले इसके सुरक्षित होने को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान किया जाना चाहिए। एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में ये सिफारिशें दी हैं।  किसानों की आमदनी दोगुनी करने पर गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट 'किसानों की आय दोगुनी करने का विज्ञान' में कहा है, 'भविष्य की फसल किस्में विकसित करने में जीएम तकनीक एक शक्तिशाली औजार है। इन किस्मों में फसल का नुकसान कम करने, इनपुट के उपयोग की कुशलता बढ़ाने, उत्पादकता संभावना और गुणवत्ता विशेषता के लिए विभिन्न जैविक और अजैविक दबावों के प्रति जीन प्रतिरोधी क्षमता होगी। इसका इस्तेमाल देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए अहम होगा और इसलिए सुरक्षित, ज्यादा उत्पादक और पोषक खाद्य फसलों के विकास के मकसद से उन पर अनुसंधान जारी रहना चाहिए।'
 
समिति ने कहा कि यह (जीएम फसलों पर शोध) व्यापक जन स्वीकार्यता के लिए ज्यादा पारदर्शी और सामाजिक समावेशी तरीके से होना चाहिए। इसके साथ ही जीएम तकनीक के विरोधियों की चिंताएं दूर की जानी चाहिए ताकि इस तकनीक को खाद्य फसलों में अपनाने से पहले खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और आर्थिक सुरक्षा को लेकर जनता की चिंताएं दूर की जा सकें।  हालांकि अभी तक केंद्र सरकार का जीएम फसलों को लेकर रुख अस्पष्ट रहा है। लेकिन स्वदेशी जागरण मंच और किसान संघ जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन लगातार जीएम फसलों का विरोध कर रहे हैं। 
 
जीन अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (जीईएसी) ने वर्ष 2017 में जीएम सरसों की व्यावसायिक बिक्री शुरू करने को मंजूरी दी थी। लेकिन इसके खिलाफ देशभर में तगड़े विरोध के बाद इसे स्थगित कर दिया गया। समिति ने गुरुवार को अपनी ताजा रिपोर्ट जारी की है। इसने रिपोर्ट में कहा है, 'भारत में जीएम कपास ने महत्त्वपूर्ण सीख दी हैं, जिसके कुछ लाभ और नुकसान दोनों हैं। इन सीखों में गैर-खाद्य फसलों में फसल विशेष और जगह विशेष की समस्याओं को खत्म करने के लिए जीन अभियांत्रिकी का इस्तेमाल भी शामिल है।'
 
समिति ने कहा है कि ट्रांसजैनिक तकनीक को नहीं अपनाने की सूरत में दुनिया को कृषि जिंसों की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए 10 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि तलाशनी होगी।  समिति ने यह भी कहा कि भारत में जीन संवर्धित तकनीक के नियमन के लिए व्यापक खाका और कड़ा प्रोटोकॉल नहीं है, इसलिए देश में उठने वाली सुरक्षा की चिंताओं का सम्मान किया जाना चाहिए। इसी तरह कृषि क्षेत्र में जेनेटिक इंजीनियरिंग के व्यापक इस्तेमाल से पहले इस तकनीक के नैतिक, सामाजिक और पर्यावरण नतीजों को समझा जाना चाहिए। यह तकनीक फसल के जीन कोड में बदलाव करती है। 
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