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नहीं बदले भारतीय कंपनियों के हालात

राजेश भयानी | मुंबई May 27, 2018 10:52 PM IST

जहाज मालभाड़ा बाजार में स्थितियां सुधर रही हैं और ऐसा लगता है कि इस उद्योग का बुरा दौर पीछे छूट चुका है। विश्लेषकों का कहना है कि अब कम से कम कुछ समय तक मालभाड़ा बाजार मजबूत रहेगा। हालांकि अगले साल से नए नियम लागू हो रहे हैं, जिनके उद्योग पर कुछ असर पड़ सकते हैं। भारतीय कंपनियों के बेड़े में एक बड़ा हिस्सा टैंकरों का है, इसलिए उनकी स्थिति में अभी सुधार नहीं आया है। 

हालात में बदलाव 

क्रिसिल रिसर्च के निदेशक बेनिफर जेहानी ने कहा, 'अब जहाजरानी क्षेत्र की वित्तीय स्थिति बेहतर होगी। मालभाड़ा दरों से पता चलता है कि ड्राई-बल्क खंड में दरें 35 फीसदी बढ़ी हैं, जबकि कंटेनर खंड की दरों में 30 से 35 फीसदी इजाफा हुआ है।' हालांकि टैंकर खंड ने इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है क्योंकि इसकी दरों में 5 से 10 फीसदी गिरावट आई है। यह गिरावट बड़े कच्चे तेल के जहाजों के लिए और अधिक है। एस्सार शिपिंग के सितंबर, 2016 से मुख्य कार्याधिकारी रंजीत सिंह ने कहा, 'वैश्विक जहाजरानी बाजार के इस रुझान से भारतीय जहाजरानी कंपनियों को भी फायदा मिलेगा।'

ड्राई-बल्क का बेहतर प्रदर्शन

भारतीय जहाजरानी क्षेत्र की अधिक आयात की वजह से टैंकरों पर ज्यादा निर्भरता है, लेकिन इस खंड ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। क्रिसिल के बेनिफर ने कहा कि ड्राई-बल्क खंड में इस साल जनवरी-अप्रैल अवधि के दौरान चार्टर दरों में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 35 से 40 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। इस खंड का वैश्विक बेड़े में 45 से 50 फीसदी हिस्सेदारी है। यह बढ़ोतरी अच्छी गुणवत्ता के कोयले एवं लौह अयस्क आयात और पूर्वी एशियाई देशों की बदौलत हुई है। 

भारतीय जहाजरानी कंपनियों की वित्तीय हालत मिलीजुली रहेगी। जेनिफर ने कहा, 'भारतीय जहाजी बेड़े में टैंकरों की हिस्सेदारी सबसे अधिक (करीब 60 फीसदी) है, जिसकी वजह पेट्रोलियम, तेल एवं पेट्रोल उत्पादों और एलएनजी के आयात पर बड़ी निर्भरता होना है।' 

 

पूर्वी एशियाई देशों में पर्यावरण को सुधारने के लिए निम्न ग्रेड के कोयले और लौह अयस्क की जगह ऊंची ग्रेड का कोयला और लौह अयस्क इस्तेमाल किए जाने से बल्क कार्गो की मांग बढ़ी है। वैश्विक ड्राई बल्क कारोबार में लौह अयस्क और कोयले का हिस्सा करीब आधा है। 

आमदनी में सुधार की आस 

एसऐंडपी ग्लोबल प्लैट्स के वरिष्ठ प्रबंध संपादक (एशिया प्रशांत जहाजरानी और मालभाड़ा) प्रदीप राजन ने कहा, 'जहाजरानी कंपनियों की आमदनी अगली 4 से 6 तिमाहियों में अच्छी रहने की संभावना नजर आ रही है। इस समय कई संकेतक सकारात्मक होते जा रहे हैं।' सुधार का एक बड़ा संकेत यह है कि बड़े जहाजों को ज्यादा दरें मिल रही हैं। ये दरें 2016 में कम थी, लेकिन पिछली कुछ तिमाहियों के दौरान बदली हैं। प्रदीप के मुताबिक टैंकर खंड में मांग से ज्यादा आपूर्ति है। इस क्षेत्र में जहाजों की उपलब्धता ऐसे समय बढ़ी है, जब ओपेक ने उत्पादन में कटौती की है। इससे तेल की ढुलाई के लिए कम जहाजों की जरूरत पड़ रही है। 

उनके मुताबिक एक अन्य स्वस्थ संकेत यह है कि वैश्विक वृद्धि दर 3.8 से 4 फीसदी के आसपास रहने की संभावना है। इतनी वृद्धि पिछले कुछ वर्षों के दौरान नहीं दिखी है। वृद्धि में तेजी से वैश्विक व्यापार बढ़ेगा, जिससे जहाजरानी कंपनियों को फायदा मिलेगा।

हालांकि आने वाले समय में उद्योग को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इनमें से कुछ चुनौतियां नए नियम, नई ढुलाई क्षमता में बढ़ोतरी और पुराने जहाजों को परिचालन से हटाना आदि होंगी। ये पुराने जहाज नए नियमों पर खरे नहीं उतरते हैं या उन्हें अद्यतन बनाने के लिए मोटे निवेश की जरूरत के कारण अलाभकारी बन गए हैं।

नए नियम बदलेंगे समीकरण 

पहला नियामकीय बदलाव जनवरी, 2020 से अमल में आएगा। इंटरनैशनल मैरिटाइम ऑर्गेनाइजेशन (आईएमओ) के जहाजों के प्रदूषण को रोकने के लिए आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के मुताबिक जहाजों को कम सल्फर मात्रा वाले ईंधन के नियम का पालन करना होगा। इन जहाजों को 3.5 फीसदी की जगह 0.5 फीसदी सल्फर मात्रा वाले ईंधन का उपयोग करना होगा। कंपनियां और देश इसे इस साल से लागू करना शुरू कर देंगे। ताइवान इसे अगले साल से लागू करेगा। कंपनियों के पास दो विकल्प हैं। या तो उन जहाजों को रखें, जो नियमों पर खरे उतरते हैं या पुराने जहाजों में स्क्रबर्स (प्रदूषण नियंत्रण उपकरण) लगाकर अद्यतन बनाएं। कम सल्फर मात्रा वाला ईंधन महंगा है, इसलिए इसका उपयोग शुरू करने से लागत बढ़ेगी। 
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