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रबर उत्पादन-खपत का अंतर शीर्ष स्तर पर

टीई नरसिम्हन | चेन्नई May 31, 2018 09:16 PM IST

टायर उद्योग ने एक बार फिर प्राकृतिक रबर के घरेलू उत्पादन और उपभोग के बीच बढ़ते असंतुलन को लेकर चिंता जताई है। रबर बोर्ड ने 2018-19 के लिए अपने एक हालिया अनुमान में उत्पादन-उपभोग का यह अंतर 4.7 लाख टन बताया है। पिछले पांच वर्षों में यह अंतर  60,000 टन से बढ़कर इस स्तर पर पहुंचा है।  हालांकि, इस पर टिप्पणी के लिए संबंधित अधिकारी तत्काल उपलब्ध नहीं थे, लेकिन ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एटमा) ने कहा कि 2018-19 में प्राकृतिक रबर उत्पादन-उपभोग का 4.7 लाख टन का यह अनुमानित अंतर ऐतिहासिक रूप में ऊंचे स्तर पर है तथा प्राकृतिक रबर की उपलब्धता का परिदृश्य और अधिक धुंधला पड़ता जा रहा है। 2011-12 में 60,000 टन की गिरावट के बाद से पिछले वित्त वर्ष में यह अंतर बढ़कर 4.1 लाख टन तक पहुंच गया और चालू वित्त वर्ष में यह और बढ़कर 4.7 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है।

 
देश के टायर उत्पादन में 90 प्रतिशत से अधिक का योगदान एटमा की 11 बड़ी सदस्य टायर कंपनियों का रहता है। टायर उद्योग देश में उत्पादित प्राकृतिक रबर का 65-70 प्रतिशत उपभोग करता है। एसोसिएशन ने सरल आयात के जरिये उद्योग को प्राकृतिक रबर उपलब्ध कराने के लिए जरूरी उपाय करने की मांग की है। प्राकृतिक रबर के घरेलू उत्पादन और उपभोग के बीच का अंतर पिछले कुछ सालों से बढ़ता जा रहा है। एटमा के महानिदेशक राजीव बुद्धराजा ने कहा कि चालू वर्ष के दौरान प्राकृतिक रबर का घरेलू उत्पादन घरेलू आवश्यकता से 40 प्रतिशत कम होने का अनुमान है। गिरावट का यह स्तर टायर उद्योग के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं, क्योंकि उद्योग ने देश में आर्थिक और ऑटो क्षेत्र की प्रगति को प्रोत्साहन देने के लिए महत्त्वाकांक्षी निवेश की व्यवस्था की हुई है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि घरेलू आवश्यकता पूरी करने के लिए प्राकृतिक रबर के लिए उद्योग की आयात पर निर्भरता आगे और बढ़ जाएगी।
 
कारखानों को चलाए रखने के लिए टायर उद्योग भारी-भरकम कर वाले प्राकृतिक रबर आयात का बोझ झेल रहा है। हालांकि, घरेलू मांग पूरी करने के लिए प्राकृतिक रबर का आयात जरूरी है, लेकिन नीतियां बहुत बाधक हैं। सीमा शुल्क (प्राकृतिक रबर आयात पर) 25 प्रतिशत है, जो प्राकृतिक रबर आयात करने वाले किसी अन्य देश द्वारा लगाए गए शुल्क से काफी ज्यादा है। इसके अलावा, केवल दो निर्दिष्टï बंदरगाहों (जेएनपीटी और चेन्नर्ई) पर ही प्राकृतिक रबर आयात को अनुमति प्रदान की गई है। इस प्रकार की बाधाओं से प्राकृतिक रबर की आयात लागत और ढुलाई के समय में इजाफा हो जाता है।
 
जहां एक ओर, प्राकृतिक रबर आयात पर शुल्क लगभग 25 प्रतिशत है, वहीं दूसरी ओर टायर की ज्यादातर श्रेणियों पर मूल सीमा शुल्क 10 प्रतिशत है। अलबत्ता, विभिन्न व्यापारिक समझौतों के तहत काफी कम दरों पर टायरों का आयात किया जा सकता है और कुछ समझौतों के तहत तो शून्य शुल्क दरों पर भी टायर आयात किया जा सकता है। ज्यादातर व्यापारिक समझौतों में प्राकृतिक रबर को नकारात्मक सूची में रखा गया है, जिसमें उद्योग को मिलने वाली शुल्क छूट का कोई लाभ नहीं मिलता है। नतीजतन, भारत से टायर निर्यात (वर्तमान में 1.5 अरब डॉलर और अगले 3-4 वर्षों में दोगुना होकर तीन अरब डॉलर पहुंचने की संभावना) को बढ़ाने के लिए टायर उद्योग की प्रतिस्पर्धी क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उद्योग ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से इस अनुमानित घरेलू कमी के बराबर प्राकृतिक रबर के शुल्कमुक्त आयात की मांग की है।
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