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कृषि कंपनियों को मिलेगी धार

दिलीप कुमार झा | मुंबई Jun 08, 2018 09:55 PM IST

इस सीजन में सामान्य मॉनसून के पूर्वानुमान के कारण बाजार की बढ़ती मांग पूरी करने के वास्ते वित्त वर्ष 2018-19 की पहली छमाही के दौरान कृषि संबंधी सामान की कंपनियों का वित्तीय प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण रूप से बढऩे की उम्मीद है। 2018 की चौथी तिमाही के दौरान कच्चे माल की कीमतों में तीव्र वृद्धि और सीजन की कमजोर मांग के कारण कृषि संबंधी सामान की  कंपनियों की बिक्री और लाभ पर भारी दबाव था। धानुका एग्रीटेक, पीआई इंडस्ट्रीज और रैलीस इंडिया जैसी कंपनियां ने 2018 की जनवरी-मार्च तिमाही के दौरान अपनी बिक्री और लाभ में गिरावट दिखाई थी। युनाइटेड फॉस्फोरस ने मार्च 2018 की तिमाही के लिए कर उपरांत अपने लाभ में 35 फीसदी की गिरावट दर्ज की थी।
 
व्यापारियों और उपभोक्ताओं - दोनों ने ही कृषि संबंधी सामान की कीमतों में गिरावट की उम्मीद से बाजार की मांग के लिए स्टॉक निर्माण से दूरी बनाए रखी। इसके परिणामस्वरूप, पाइपलानइ स्टॉक पूरी तरह से खत्म हो गया। अब, मॉनसून की बारिश की शुरुआत के बाद मांग का सीजन आरंभ होने के कारण कृषि संबंधी सामान की कंपनियों का सकल राजस्व और शुद्ध राजस्व जून तिमाही के मुकाबले सितंबर तिमाही में बेहतर होने जा रहा है। धानुका एग्रीटेक लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एमके धानुका ने कहा कि मांग के इस सीजन में कृषि संबंधी सामान की कंपनियां अपने लाभ मार्जिन को बरकरार रखने के लिए कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी को उपभोक्ताओं पर डालने में सक्षम दिखेंगी। इसकेअलावा, मॉनसून के मौजूदा सीजन में बारिश जून के अंत तक विस्तृत होती है। इसलिए जून तिमाही को कमजोर सीजन माना जाता है। कृषि संबंधी वस्तुओं की बढ़ती मांग के साथ मौसम का परिदृश्य सितंबर तिमाही के दौरान स्पष्ट होता है। इस वजह से बिक्री और लाभ केहिसाब से सितंबर तिमाही बेहतर होने की उम्मीद है।
 
सामान्यत: कीटों के हमले, बाढ़ या सूखे जैसी मौसम संबंधी विविधता की रिपोर्ट सितंबर तिमाही के दौरान ही स्पष्ट हो पाती है, जिसके परिणामस्वरूप बीज, उर्वरक और कृषि रसायनों की मांग बढ़ जाती है। सामान्य मॉनसून के सीजन में बुआई क्षेत्र में भी वृद्धि की उम्मीद से कृषि संबंधी वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है। धान, कपास, दलहन, सोयाबीन, मक्का आदि खरीफ की वे फसले हैं, जो मॉनसून की बारिश की शुरुआत के साथ बोई जाती हैं। इस बीच, घरेलू बाजार में कृषि रसायन की खपत 2018 की चौथी तिमाही केदौरान शांत रही है। साथ ही, खरीफ की जोरदार फसल ने कई फसलों की कीमतों को मंद बनाए रखा और इसके परिणामस्वरूप किसानों के लाभ पर असर पड़ा, जिससे महंगे कृषि रसायन खरीदने की उनकी क्षमता क्षीण हो गई।
 
एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड के विश्लेषक प्रतीक थोलिया ने कहा कि अधिकांश कृषि रसायन कंपनियों ने कच्चे माल में मुद्रास्फीति के दबाव की वजह से मार्च तिमाही के दौरान एबिटा मार्जिन में संकुचन दर्ज किया है। वित्त वर्ष 19 की पहली तिमाही में कच्चे माल की लागत में वृद्धि जारी रही और दूसरी तिमाही के मध्य से ही स्थिर होने की संभावना है। हालांकि, रुपये के मूल्य में गिरावट के साथ-साथ फॉस्फोरिक एसिड और प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों से उर्वरक क्षेत्र में मार्जिन पर दबाव पडऩे की संभावना है। अलबत्ता, ज्यादातर कंपनियों ने मिश्रित उर्वरकों में 2,000-3,000 रुपये प्रति टन की कीमत वृद्धि की है, जो कच्चे माल के मुद्रास्फीति दबाव को आंशिक बराबर कर कर देगी।
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