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लहसुन के दामों में तीव्र गिरावट 'भावांतर' से नहीं मिल रहा लाभ

संजीव मुखर्जी | पिपलियामंडी (मंदसौर) Jun 10, 2018 09:00 PM IST

मंदसौर के सोनी गांव के संतोष राठौर अफसोस जताते हुए कहते हैं कि कुछ साल पहले हम कहा करते थे कि अगर कोई लहसुन से भरी गाड़ी मंडी ले जाए, तो वह घर वापसी के दौरान एक नया ट्रैक्टर खरीद सकता है। लेकिन अब ऐसा लगता है कि किसान के पास जो ट्रैक्टर है, वह भी खर्चे का भुगतान करने के लिए बेचना पड़ सकता है। खरीफ की मुख्य फसल सोयाबीन के खराब अनुभव के बाद राठौर ने कुछ पैसा कमाने की चाह में अपनी एक हेक्टेयर जमीन पर लहसुन की खेती की थी। लेकिन दामों में हालिया गिरावट ने उन्हें बर्बाद कर दिया है। भविष्य में बेहतर दाम मिलने की उम्मीद से अब उन्होंने मंडी जाना छोड़ दिया और फसल का स्टॉक कर लिया है। घर के बाहर एकत्रित किए गए लहसुन के बोरों की ओर इशारा करते हुए राठौर कहते हैं कि मैं लंबे समय तक इंतजार नहीं कर सकता हूं। मॉनसून के आते ही लहसुन खराब होने लगेगा और सर्दियों तक तो मुझे इसे मिट्टïी के भाव में बेचना पड़ सकता है।

कभी किसानों के लिए किसी बुरे वक्त में अंतिम विकल्प के रूप में समझे जाने वाले लहसुन ने इस बार मध्यप्रदेश के प्रमुख खेती वाले क्षेत्र - मंदसौर और नीमच में किसानों को मझधार में छोड़ दिया है। राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास फाउंडेशन (एनएचडी आरएफ) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मंदसौर और इंदौर मंडियों में लहसुन के दाम पिछले साल की तुलना में इस साल मार्च और मई के बीच लगभग 59 प्रतिशत तक गिर चुके हैं। यह जोरदार फसल का सीजन रहा है और राज्य द्वारा लहसुन को भी भावांतर भुगतान योजना (बीबीवाई) में शामिल किया गया है। लेकिन असलियत में, लहसुन को इस लोकप्रिय भावांतर भुगतान योजना में शामिल किए जाने के बाद से दाम और गिरना शुरू हो गए हैं। किसानों के अनुसार, पहले लहसुन को 2,500 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचा जाता था। लेकिन कुछ महीने पहले भावांतर भुगतान योजना के तहत लहसुन बेचने का जरिया खोले जाने के बाद दाम गिरकर 800 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए।
 
इस बीच, हाल ही में मंदसौर में आयोजित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की रैली में कई वक्ताओं ने लहसुन के गिरते दामों का मुद्दा उठाया। गांधी ने जनसमूह से बार-बार उस कीमत के बारे में पूछा, जिस कीमत पर उन्होंने इस साल लहसुन बेचा और पिछले सालों से दाम कितने अलग रहे। हालांकि, राज्य सरकार ने दावा किया है कि कीमतों में इतनी तेज गिरावट का कारण अधिक उत्पादन है, लेकिन मंदसौर के किसान इस तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। मंदसौर के मगराना गांव के भेरूलाल सवाल करते हैं कि अगर उत्पादन अधिक है, तो पिछले साल दाम इतने कमजोर क्यों नहीं थे, जब हमने लगभग समान क्षेत्र में ही फसल की खेती की थी। वे कहते हैं कि उनके रिश्तेदारों ने अच्छे दाम पाने के लिए चंबल के जलमग्न क्षेत्र में जमीन पट्टïे पर ली थी, लेकिन अब दामों में गिरावट की वजह से उन्हें पट्टे की राशि चुकाने में मुश्किल हो रही है। भेरूलाल कहते हैं कि उनमें से कई ने फसल को सढऩे के लिए अपने खेतों में ही छोड़ दिया है। भावांतर भुगतान योजना के तहत राज्य सरकार ने लहसुन के लिए प्रति क्विंटल 800 रुपये के दामों की गारंटी दी है, लेकिन व्यापारी प्रति क्विंटल 300 रुपये से अधिक कुछ भी नहीं देना चाहते हैं और हमें बाकी पैसा सरकार से लेने के लिए कह रहे हैं। हम भावांतर भुगतान योजना के बिना ही ज्यादा ठीक थे, क्योंकि बढिय़ा सीजन में कम से कम हम अच्छे दाम तो प्राप्त कर सकते थे।
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