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मध्यप्रदेश की भावांतर योजना का अध्ययन कराएगा केंद्र!

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली May 21, 2018 12:59 PM IST

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत खरीद सुनिश्चित करने के लिए इसके ढांचे को अंतिम रूप देने से पहले केंद्र नीति आयोग आदि द्वारा सुझाए गए खरीद के तीन प्रारूपों के सभी अच्छे-बुरे पहलुओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करेगा। अधिकारियों का कहना है कि इस संबंध में फैसला जल्द आने की उम्मीद नहीं है।

मध्यप्रदेश की भावांतर भुगतान योजना (मूल्य ह्रस भुगतान योजना) में उसकी प्रभाव क्षमता और समस्याओं का विश्लेषण करने के लिए एक अध्ययन कराया जा सकता है। यह योजना उन जिंसों की सीधी खरीद के वैकल्पिक रूपों में से एक है, जिनकी कीमतें निर्धारित एमएसपी से नीचे गिर चुकी हैं। इसके बारे में काफी चर्चा की जा रही है। यह अध्ययन देश में किसी प्रतिष्ठित थिंक-टैंक द्वारा किया जा सकता है।

मध्यप्रदेश सरकार की भावांतर भुगतान योजना के तहत एमएसपी से नीचे बिक्री करने पर किसानों द्वारा उठाए गए नुकसान के एक भाग का भुगतान राज्य करता है। राज्य ने 2017 के खरीफ सीजन से इस योजना की शुरुआत की थी और अगले रबी सीजन में इसे आगे बढ़ाने की योजना बना रहा था, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक शुरुआत की प्रतिक्षा में केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय मदद नामंजूर किए जाने के बाद उसे प्रमुख जिंसों को अचानक वापस लेना पड़ा था।

इस योजना का अध्ययन अन्य राज्यों द्वारा किया जा रहा था, साथ ही व्यापारियों द्वारा हथियाए जाने और खराब तरीके से काम करने की आरोपों की वजह से यह योजना एक पहेली बन गई थी।  केंद्र सरकार जिस अन्य प्रारूप पर जोर देने का प्रयास कर रहा है, वह खरीद का और अधिक प्रत्यक्ष प्रारूप है, जिसमें कीमतें एमएसपी से नीचे गिरने पर राज्य जिंसों को खरीदने के लिए स्वतंत्र होते हैं, जबकि केंद्र नुकसान का एक हिस्सा साझा करता है।

मार्केट एश्योरेंस स्कीम (एमएएस) नामक इस योजना ने कीमतों में गिरावट के मामले में राज्यों को बाजार में हस्तक्षेप करने की परिचालनात्मक स्वतंत्रता प्रदान की है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 के अपने बजट भाषण में घोषणा करते हुए कहा था कि अब से सभी एमएसपी सैद्धांतिक रूप से अपनी उत्पादन लागत (ए2+एफएल) की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक तय किए जाएंगे, तब उन्होंने नीति आयोग को भी खरीद के एक प्रारूप को अंतिम रूप देने का निर्देश दिया था, जो यह सुनिश्चित करेगा कि अधिकतम किसानों को एमएसपी का लाभ मिले।

इस तरह, नीति आयोग एक अवधारणा-पत्र लाया है जो खरीद के तीन प्रारूपों पर प्रकाश डालता है। इसमें एमएएस, मूल्य ह्रस भुगतान और निजी एजेंसियों द्वारा खरीद भी शामिल है। इस पत्र को राज्यों के साथ व्यापक चर्चा के बाद अंतिम रूप दिया गया है। नीति आयोग के इस पत्र के अनुसार, एमएएस के अंतर्गत वार्षिक व्यय 405 अरब रुपये से 540 अरब रुपये के बीच हो सकता है, जो नुकसान की साझा राशि पर निर्भर होगा।

जबकि मूल्य ह्रस भुगतान योजना के अतंर्गत यह व्यय 300 अरब रुपये से कम होने की उम्मीद है। हालांकि, केंद्र सरकार के अधिकारियों का कहना है कि यह व्यय और कम हो सकता है जो 200-250 अरब रुपये के आसपास रह सकता है। जिस तीसरे प्रारूप पर चर्चा की जा रही है, वह एमएसपी में खरीद के लिए निजी खिलाडिय़ों की सक्रिय भागीदारी है। इन निजी पक्षों को पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये चुना जाता है।

 

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